शिक्षक का जादू
March 21, 2021संवाद
"शिक्षक का जादू"
एलिसनGeology के टीचर UK से रिटायर होने के बाद चीन में नौकरी करने लगे। अचानक 4 जनवरी2021को उनका आधा शरीर लकवाग्रस्त हो गया। डॉक्टरों के अनुसार एक और स्ट्रोक आने की संभावना थी,अतः शिक्षक पूर्ण- लकवाग्रस्त होने के पहले अपने देश वापस लौट जाना चाहते थे। किंतु सफर के लिए ₹50लाख की जरूरत थी। एलिसन की बेटी क्लेयर ने मदद के लिए गोफंडमी नाम से पेज शुरू किया।
आश्चर्य की बात कि 6 घंटे में एलिसन के छात्रों ने यह राशि अपने टीचर के लिए जुटा दी। किसी छात्र-जैक ने 12लाख रुपए दान में दिए तो किसी ने 3000 भी। राशि महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि सबसे महत्वपूर्ण है छात्रों का यह भाव कि इस शिक्षक ने हमारी जिंदगी संवारने में अपने आप को पूर्णरूपेण खपा दिया, ऐसे शिक्षक के लिए जो कुछ भी कर सकें, वह बहुत कम है।
इस खबर को पढ़ने के बाद मेरे जेहन में भारतीय संस्कृति की गुरुवर वरतंतु वाली वह प्रसिद्ध कहानी ताजा हो गई। वरतंतु ने अपनी सारी विद्या अपने शिष्य कौत्स को दे दी। शिष्य ने जब दक्षिणा देने की बात पूछी तो गुरु ने कहा कि मेरी विद्या ग्रहण कर लेना ही मेरे लिए सबसे बड़ी दक्षिणा है। किंतु कौत्स बिना दक्षिणा दिए हुए आश्रम से जाना नहीं चाहता था।
गुरु ने परीक्षा लेने के लिए 12 करोड़ स्वर्ण-मुद्राएं दक्षिणा मेँ मांग ली।कौत्स ने राजा रघु की सहायता से दक्षिणा की राशि लाकर गुरु के चरणों में रख दी।
वरतंतु-कौत्स की प्राचीनतम कहानी तथा एलिसन-जैक की आधुनिकतम कहानी में मुझे कोई अंतर नहीं दिखता। दोनों जगह एक तरफ ज्ञान और प्रेम से भरा हुआ शिक्षक है तो दूसरी तरफ श्रद्धा और सीखने के भाव से भरा हुआ छात्र।
मेरा मानना है कि हर इलाके में ऐसे शिक्षक और छात्र हैं। खुद का मेरा जीवन खेल की दुनिया में बहुत दूर चला गया था किंतु उसे पढ़ाई की दुनिया में आगे बढ़ाने वाले ज्ञान और प्रेम से भरे हुए शिक्षक थे।
किंतु खासकर सरकारी शिक्षा संस्थानों में शिक्षक और छात्र के बीच एक ऐसी व्यवस्था दीवार बनकर उभर रही है,जिसके कारण ज्ञान का आदान-प्रदान कागजों में ज्यादा चल रहा है और वास्तविकता में कम। पोषाहार,चुनाव,जनगणना, छात्रवृत्ति और सूचना के लिए शिक्षक नहीं बना है, ये सारे काम तो कोई दसवीं पास व्यक्ति भी कर देगा।
अगली पीढ़ी में अपने ज्ञान और प्रेम के हस्तांतरण के लिए शिक्षक बना है।
इस ज्ञान की सदी में शिक्षक जैसे महान माध्यम से सिर्फ सूचना इकट्ठा करने का काम लिया जाए तो क्या यह बुद्धिमानी होगी? 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹