संवाद


"कोरोना की रिपोर्ट"


पिछले 20 दिनों से बेड पर अपराध-भावना के साथ कोरोना के खौफ मेँ जी रहा था। बुखार-खांसी के बाद थोड़ी बढ़ती कमजोरी के साथ कोरोना की आशंका घर करने लगी।


मास्क पहनना, सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करना और सारे एहतियात बरतने के साथ घर की शादियों में भी नहीं गया। सिर्फ कॉलेज में नियमित कक्षाओं को पढ़ा रहा था और वह भी पूरी सावधानी के साथ।


पता नहीं चल रहा था कि चूक कहां पर हुई? एक तरफ पूरे परिवार को मुसीबत में डालने का अफसोस मन में बार-बार हो रहा था तो दूसरी तरफ इससे ज्यादा सावधानी और संयम की उम्मीद भी मैं अपने आप से नहीं कर सकता था।


सीटी स्कैन के बाद थोड़े इंफेक्शन का पता चला तो दवा लेने के साथ कोविड टेस्ट के बारे में निर्णय लिया। ज्यों ही रिपोर्ट नेगेटिव आया तो मनोबल पूरा का पूरा सकारात्मक हो गया। एक शिफ्ट में 10 घंटे आने वाली नींद आज दो-चार घंटे में ही टूट गई। मुझे कोरोना नहीं है,इस भाव ने अदम्य उत्साह से भर दिया। बहुत दिनों के बाद मैं व्हाट्सएप को देख पा रहा था और उस पर कुछ लिख पा रहा था।


एक तरफ चुनावी रैलियों और धार्मिक-सामाजिक आयोजनों में लाखों लोगों को बिना मास्क के देखता हूं और दूसरी तरफ पूरी सावधानी के बावजूद कुछ लोगों को संक्रमित होते हुए देखता हूं तो मुझे WHO द्वारा दिए गए वैश्विक-महामारी शब्द पर ध्यान जाता है। अनुसंधान एवं सेवा में लगे हुए लोग भी इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं किंतु लापरवाही से जीने वाले लोग तो इसे पूर्णरूपेण वैश्विक-महामारी बनाने पर तुले हुए हैं।


मैंने सुना था कि दुख जगा देता है किंतु यहां तो महामारी का नंगा-नृत्य भी लोगों को जगाने और सतर्क बनाने में समर्थ नहीं हो रहा है।


इन दिनों अपने पाप-पुण्य का हिसाब करते हुए कई तात्विक-प्रश्न भी अनजाने दिमाग में उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं।


अपने चाहने वाले लोगों की शुभकामनाओं और सर्वे भद्राणि पश्यंतु से बढ़कर ऐसे संकट की घड़ी में कोई दूसरी शक्ति नहीं दिखती। पूर्णरूपेण वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जीने के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं दिखता; सिवाय"सर्व मंगल मांगल्ये... प्रार्थना के


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹