संवाद


"राजधर्म बनाम नागरिकधर्म"


अनियंत्रित होती हुई कोरोना की भयावह स्थिति के लिए परस्पर- दोषारोपण इस समय सबसे दुखद और निरर्थक पहलू हैं।


सत्ताधीशों के चुनावी प्रचार के तरीके उतने ही निराशापूर्ण है जितने बिना मास्क व दूरी के नागरिकों के जीने के सलीके। चिकित्सक और वैज्ञानिक समुदाय आश्चर्यचकित हैं कि जिस समय महामारी का दौर चल रहा है, उस समय चुनाव को क्यों नहीं रोका जा सकता या वर्चुअल प्रचार क्यों नहीं किया जा सकता और सामान्य नागरिक मास्क व दूरी के सामान्य नियम का पालन क्यों नहीं कर सकते?


महामारी का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव चिकित्सक समुदाय पर पड़ा है। दिन-रात प्रतिकूल परिस्थितियों में अपना सेवा धर्म निभाते हुए उनका धैर्य अब जवाब देने लगा है। अभी राजा और प्रजा दोनों की आंखों में चिकित्सा से जुड़े लोगों का त्याग- बलिदान बिठाने की जरूरत है। उन्हें तो छुट्टी भी नहीं मिल सकती और छुट्टी मिलने पर भी अपनों से वे संक्रमित स्थान पर काम करने की वजह से नहीं मिल सकते।


कोरोना के हल्के चपेट में आने से मुझे इतनी ज्यादा कमजोरी महसूस हो रही है कि डॉक्टर ने लंबे विश्राम की सलाह दी है किंतु जब उसी डॉक्टर से मैंने पूछा कि आप तो कोरोना पॉजिटिव होने के बाद भी एक सप्ताह में काम पर लौट आए तो हंसकर उन्होंने प्यारा सा जवाब दिया कि मेरा विकल्प नहीं है।-


चारा नहीं कोई जलते रहने के सिवा ,


सांचे में फना के ढलते रहने के सिवा;


ऐ शमा! तेरी हयाते फानी क्या है?


झोंका खाने और संभलते रहने के सिवा।।


डॉक्टर साहब का जवाब सुनकर मुझे पता लगा कि धर्म का उदय तो इस दृष्टिकोण से होता है कि इस परिस्थिति में मेरा कोई विकल्प नहीं है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹