संवाद


"एक भी संदेश आशा का नहीं देते सितारे"


अजीब समय है। न्यूज़ चलाओ तो जान बचाने को दौड़ता-भागता इंसान और अपनी बारी के इंतजार में भरे हुए हॉस्पिटल- श्मशान ; कहीं फोन लगाओ तो भय के वातावरण में घिरे रिश्ते- नातेदारों का शंका-समाधान । पास पड़ोस में दूर से ही राम-राम; थोड़े वार्तालाप के लिए फल-सब्जी या किराना की दुकान । तन के लिए बहुत छोटा स्थान और मन के लिए विषाद बढ़ाने वाली सूचनाओं का पूरा खुला आसमान


अचानक फोन की घंटी बजी और बातचीत में पता चला कि धनी और रसूखदार रिश्तेदार के 4 सदस्य अचानक ऑक्सीजन लेवल डाउन होने के कारण चार एंबुलेंस में बेड और ऑक्सीजन की खोज में भिन्न-भिन्न अस्पतालों में परेशान हुए। बेड मिल जाने पर डॉक्टर के आने में देर और डॉक्टर के आ जाने पर ऑक्सीजन सिलेंडर में देर। यह करूण कथा कहते हुए प्रियजन की जबान लड़खड़ाने लगी और मेरे मन में एक ही बात बार-बार घूमने लगी कि जिस देश में डॉक्टर्स की इतनी कमी है,उस देश में मेडिकल की पढ़ाई इतनी महंगी क्यों? स्वास्थ्य-सेवा पर बजट का इतना कम प्रतिशत क्यों? बढ़ते मरीजों की संख्या से परेशान होकर कुछ जगह पर डॉक्टरों ने हड़ताल पर जाने का फैसला लिया है ,यदि ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियां बढ़ती गई तो आने वाले दिनों में कितने भयावह दृश्य आंखों को देखने पड़ेंगे-


"प्रकृति ने मंगल शकुन पथ मेँ नहीं अपने संवारे।


एक भी संदेश आशा का नहीं देते सितारे।।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹