आपद्-धर्म
April 23, 2021संवाद
"आपद्-धर्म"
सुनामी के समय में कई आदिवासी और जीव-जंतु भी पेड़ों पर चढ़ गए थे और वे सुरक्षित बच गए। विशेषज्ञों का कहना हैं कि दूसरी लहर की सुनामी में जो भी समूह से अलग एकांत में चला जाएगा,वो बच जाएगा।
घर में भी मास्क पहनने वाला समय आ गया है। बाहर के लिए तो दो-तीन लेयर वाला मास्क चलन में आ गया है।
लेकिन इस रोग की प्रकृति ऐसी है कि एक रोगी के लिए सहायता हेतु कम से कम दो-तीन व्यक्ति चाहिए। दिल्ली में रह रहे अपने भाई से कल मैंने बात की तो पता चला कि आरोग्य सेतु के अनुसार अगल-बगल 500 मीटर के रेडियस में 400 व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव है और बिहार में घर पर परिवार के लोग संक्रमित हो चुके हैं। पूर्णतया वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने के कारण और जागरूक-शिक्षक होने के कारण मैं तो अभी तक संक्रमित नहीं हूं किंतु इस समय घर जाना जरूरी है जबकि डॉक्टर यात्रा से मना कर रहे हैं । अब ऐसी आपातकालीन स्थिति में क्या किया जाए?
ऐसी आपातकालीन स्थिति में डॉक्टरी सलाह के साथ अंतरात्मा की आवाज को भी सुनना ही पड़ेगा । वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ रहते हुए डॉक्टर भी संक्रमित रोगियों की भीड़ में सेवा दे रहे हैं- यह आपद्-धर्म है।
एक समय सत्य बोलने और हिंसा न करने को धर्म कहा गया किंतु आज भीड़ में न जाने और मास्क पहने को धर्म कहा जाएगा। रैली और मेले में जाने की तो बात छोड़िए;किसी सामाजिक समारोह में भी जाना अब अधर्म लगने लगा है। किंतु किसी अनिवार्य सेवा पर यह बात लागू नहीं होती। डॉक्टर बार-बार आंखों में आंसू लिए हुए हाथ जोड़कर विनती कर रहे हैं कि कुछ दिनों के लिए इस आपद्-धर्म का पालन अवश्य कीजिए ;वरना सब की जिंदगी खतरे में है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹