संवाद


"डॉक्टर की आंखों में आंसू"


मेरे जीवन का सबसे काला दिन है क्योंकि जिंदगी भर जान बचाने वाला डॉक्टर आज व्यवस्था के कारण ऑक्सीजन की कमी से अपने मरीजों को अपनी आंखों के सामने दम तोड़ते हुए देख रहा था-जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल के डॉक्टर बलुजा यह कहते हुए रो पड़े--डॉक्टर का काम रोग का इलाज करना है और दिन-रात हम सभी व्यवस्था के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं और वे कोई जवाब नहीं दे रहे हैं। मरीजों को हमें कहना पड़ रहा है कि सिलेंडर और दवाई का इंतजाम करके आओ,तब हम देखेंगे; ऐसे वाक्य बोलते समय हमारी जिह्वा लड़खड़ा जाती है।लेकिन हम मजबूर हैं। हम क्या करें? हम कहां जाएं??


इस व्यवस्था से भी पाई क्या सुरक्षित जिंदगी,


जिसको देखो कह रहा है बच गया मैं बाल-बाल।


उनसे भी शिकवा बहुत था, आपसे भी है मलाल


बरगदों ने कब रखा है पेड़-पौधों का ख्याल।।


यह कौन सी व्यवस्था हमारे सामने में उभर कर आई हैं जिसमें महामारी- विशेषज्ञों द्वारा दूसरी लहर को लेकर पहले से ही बार-बार सावधान किया जा रहा था, मीडिया द्वारा लगातार व्यवस्था की कमियों को बताया जा रहा है, डॉक्टरों द्वारा ऑक्सीजन की कमी और अन्य परेशानियों को बार-बार गिनाया जा रहा है और न्यायालय द्वारा कड़े शब्दों में चेताया जा रहा है फिर भी ऑक्सीजन के पर्याप्त उत्पादन के बावजूद आपसी सामंजस्य की कमी के कारण जरूरत की जगह पर ऑक्सीजन न पहुंच सका और मरीजों ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।


जब दिल्ली के गोल्डन हॉस्पिटल का यह हाल है तो अंदाजा लगाएं कि अन्य शहरों,कस्बों और गांवों में क्या हो रहा होगा?


जिस देश में हर क्षेत्र का विशेषज्ञ रो रहा हो कि मेरी कोई नहीं सुनता,उस देश में हंस कौन रहा है??


यह कौन मर गया है सरेआम इस तरह,


सड़कों पर पड़ी लाश है,हम किस तरह हंसें?


पूरा शहर उदास है,हम किस तरह हंसें,


मौसम भी बदहवास है, हम किस तरह हंसें??


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹