संवाद


"दान की अनोखी अदा"


कूड़े-कचरे के ढेर में जैसे कोई हीरा मिल जाए ऐसे ही समाचारपत्र में नकारात्मक खबरों को पढ़ते हुए एक ऐसी सकारात्मक खबर मिल गई। केरल के विकलांग बीड़ी मजदूर जनार्दन जी ने वैक्सिन के लिए ₹200000 की जीवन भर की जमा पूंजी दान कर दी। अब उनके खाते में सिर्फ ₹850 बचे हैं।


बैंक अधिकारियों ने उन्हें समझाया भी कि सारा पैसा दान कर देंगे तो आपका खर्चा कैसे चलेगा?


उनका जवाब था कि मेरी जरूरतें बीड़ी बनाने के काम और विकलांग पेंशन से चल जाता है। इससे ज्यादा की आवश्यकता मुझे नहीं है।


और इस महादान की गरिमा को बढ़ाने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि इस महान आत्मा ने किसी को बताया तक नहीं । उनके दान की जानकारी एक बैंक अधिकारी ने सोशल मीडिया पर शेयर की। मेरी आंखें आकाश की ओर उठ गई और परमात्मा से पूछने लगी-


हे परमात्मा!तू ऐसा हृदय किस मिट्टी से बनाता है?


जो चुपके से अपना सर्वस्व दे जाता है,


और कहीं डंका भी नहीं बजाता है


फिर भी खुद में खुद से पूरा संतुष्ट नजर आता है।।


जिस जमाने में जनता का पैसा जनता के लिए देकर भी प्रचार पर सरकारें करोड़ों रुपया खर्चा करती हैं और बड़े अभिमान के साथ 'हमने दिया' ऐसा कहती हैं। और समाज के रईस-ठेकेदार अपने अरबों की बेईमान कमाई में से हजार देकर भी दानवीर होने का ढिंढोरा पीटते हैं ,उस जमाने में एक बीड़ी मजदूर का यह दान हमें बहुत कुछ सिखाता हैं-


(1) महामारी के विरुद्ध एक मानव- यज्ञ चल रहा है।उसमें हर मानव की एक निश्चित भूमिका होनी ही चाहिए।


(2) देने का आनंद(Joy of giving) इतना बड़ा होता है कि उसके बाद किसी को बताने की सुध कहां रहती हैं?


(3) असली अमीर तो वह है जो यह जानता है कि जो प्राप्त है,वह पर्याप्त है।


(4) जरूरतें तो बहुत कम किंतु मानव कल्याण की इच्छा या कामना बहुत बड़ी हो तो आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाता है।


जनार्दन का अर्थ परमात्मा और कृष्ण या विष्णु दोनों होता है। परमात्मा की कृपा के बिना यह संभव नहीं है कि देने का भाव मन में उत्पन्न हो; और देने का भाव भी ऐसा कि जीवन भर की जमा-पूंजी दे दी जाए। और वह भी चुपचाप


धन्य हो जनार्दन!


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹