संवाद


"सत्य और मतैक्य कहाँ?"


समस्या के समाधान की पहली शर्त है- सत्य को यथातथ्य पूर्णरूपेण स्वीकारना और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना। अर्ध-सत्य तो झूठ से भी बदतर होता है।


मौत के आंकड़े कुछ और कह रहे हैं और लगातार जलती चिताएं कुछ और। ऑक्सीजन की उपलब्धता के संबंध में सरकारी बयान कुछ और है और डॉक्टर के बयान कुछ और। वैक्सीन मुहैया कराने के संबंध में पार्टियों के अलग-अलग वक्तव्य हैं और विशेषज्ञों के वक्तव्य कुछ और।


बीज रूप में जब समस्या थी तो ध्यान नहीं दिया गया और आज विकराल रूप ले चुकी है तो कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं। सभी एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं तो प्रजा के मन में अपने प्रतिनिधि के प्रति अविश्वास के भाव उठ रहे हैं-


चलो अब किसी और के सहारे लोगों


बड़े खुदगर्ज हो गए हैं किनारे लोगों।


क्या गुजरेगी सफीने पर खबर नहीं,


अंधड़ से मिल गई हैं पतवारें लोगों।।


यह समय तो सामूहिक जिम्मेदारी की भावना का है लेकिन नेतृत्व को सत्य और तथ्य के साथ आगे बढ़ना होगा।


विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की जनसंख्या इतनी ज्यादा है और दूसरी लहर का प्रकोप इतना बड़ा है कि कैसी भी तैयारी कम पड़नी ही थी।


जहां सब कुछ जाने का खतरा हो वहां जो बच सके,उसे बचा लेना बुद्धिमता है। यदि वायरस अपना म्युटेंट बदल रहा है तथा और घातक होता जा रहा है तो यह समय और नसीब के प्रतिकूल होने का संकेत है। सरकार हो या डॉक्टर या जनता कोई कुछ भी नहीं कर सकता सिवाय अपने-अपने धर्म के निर्वाह के।


हां!एक उपाय है। पहले की गलतियों से सबक लेकर विशेषज्ञों के अनुसार सरकार व्यवस्था में तत्पर हो और जनता अपना नागरिक धर्म निभाने में ; तब संकट की विभीषिका कुछ कम हो सकती है।


हितोपदेश में कबूतरों के राजा चित्रग्रीव की कथा आती है कि जंगल में शिकारी के द्वारा बिखेरे गए चावल के दाने को खाने के लिए बड़ों के द्वारा मना किए जाने पर भी सारे कबूतर उतर गए और जाल में फंस गए।तब जिसके कहने पर नीचे उतरे थे,उसे कुछ लोग गाली देने लगे।राजा चित्रग्रीव ने कहा कि परस्पर दोषारोपण में समय बर्बाद मत करोअब समस्या पर ध्यान दो कि इसका समाधान क्या है।


सभी मिलकर जाल लेकर उड़ चलो। आपस में लड़ने की जगह सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना से जब सारे कबूतर एक हो गए तो जाल लेकर उड़ गए और शिकारी देखता रह गया।


आज की परिस्थिति यही है कि हम लोग महामारी के जाल में फंस चुके हैं। ऐसे समय में किसके कारण फंसे इस पर समय बर्बाद करना व्यर्थ है। मन:स्थिति यह होनी चाहिए कि सत्य को स्वीकार कर आपस में मिलकर समाधान पर ध्यान केंद्रित किया जाए।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹