चुनाव
May 1, 2021संवाद
शब्द के बदलते अर्थ
चुनावी नतीजे कल आने वाले हैं लेकिन असली नतीजे तो हम भुगत ही रहे हैं। "चुनाव" शब्द अब डराने लगा है। कभी यह चुनाव शब्द उत्सुकता और उत्तेजना से गहरा संबंध रखता था। अपने पसंद के उम्मीदवार और पार्टी की स्थिति जानने में गहरी दिलचस्पी रहती थी। एग्जिट पोल से लेकर चुनावी नतीजे तक आंखें गड़ाए रखना और सभी विश्लेषकों पर अपने विचार बनाना सामान्य फितरत थी।
पर आज के माहौल में चुनाव शब्द की चर्चा भी ऐसे खटक रही हैं जैसे किसी ने घाव पर मिर्ची डाल दी हो।-
"नीकी पै फीकी लगे, बिन अवसर की बात
जैसे बरनत युद्ध में रस श्रृंगार न सुहात।"
अच्छी लगने वाली बात भी गलत अवसर पर बहुत खटकने लगती है। महामारी के विरुद्ध युद्ध के समय चुनावी श्रृंगार की चर्चा अजीबोगरीब लग रही।जब कोरोना का संक्रमण फैल रहा था,उस समय भारी भीड़ को देखकर हृदय कांप उठता था। विशेषज्ञ बताते थे कि यह महापाप हो रहा है। तब नेताओं के हंसते चेहरे और जहरीली जुबान देखकर रातों की नींद उड़ जाती थी। उनके रोड शो में उनके बड़े कटआउटस् और उनके नारे के साथ बड़ी हुजूम को बिना मास्क के देख कर जानकार कहते थे कि यह क्या हो रहा है,कुछ पता नहीं चल रहा।
जब चुनाव में कई शिक्षक और कर्मचारियों के मरने की खबर आ रही है और WHO तथा न्यायालय ने संक्रमण के लिए मुख्य रूप से इस को जिम्मेदार ठहराया है तो चुनाव शब्द ही डराने वाला बन गया है।
जैसे एक समय भाई शब्द बहुत आदरसूचक था तभी तो राम जी हनुमान जी को "तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई" कहते हैं किन्तु आज भाई शब्द डॉन के लिए प्रयुक्त होता है ,मुख्यतः मुंबई में। भाई की तरह चुनाव शब्द भी आज उत्तम स्थान से अधम स्थान पर गिर गया और सुपरस्प्रेडर के रूप में देखा जाने लगा है।
जब देश में हाहाकार मचा हुआ हो तो कौन हृदयविहीन होगा जिसकी रुचि किसी की हार में या किसी की जयकार में होगी-
"जब राह दिखाने वाला राह भटकाने लगे तो हम कहां जाएं?
बेमौत मर चुके लोगों को दफनाना हो तो हम कहां जाएं??"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹