संवाद


"पत्रकार का अंतिम संदेश"


दिवंगत सरदाना जी के अंतिम वीडियो संदेश को सुनकर मुझे ऐसा लग रहा है कि अपने पत्रकार जीवन के अनुभव का सार कह कर वे मुक्त हो गए । "एक देश के तौर पर,एक इंसान के तौर पर और एक डेमोक्रेसी के तौर पर हम पूरी तरह से निकम्मे ,भ्रष्ट और बर्बर साबित हुए हैं" -उनकी यह स्वीकारोक्ति उन करोड़ों दिलों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो महसूस तो यही करते हैं किंतु किसी बाध्यता के कारण उसे शब्द नहीं दे पाते और कहीं कह नहीं पाते। व्यवस्था की गहराई में जाकर नजदीक से प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ के प्रतिनिधि ने जो देखा, उसे दुनिया के सामने अलविदा कहने के पहले लाकर बड़ा उपकार किया है।


उनके अनुसार इस व्यवस्था ने इस संकटकाल में सबको अपने हाल पर छोड़ दिया और भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर को बिलख-बिलख कर रोने पर मजबूर कर दिया। ऑक्सीजन की व्यवस्था न होने के कारण डॉक्टर अपने मरीजों को अपनी आंखों के सामने तड़प -तड़प कर मरते हुए देख रहे हैं और उन्हें अपने प्रोफेशन से वितृष्णा हो रही है।


इन दृश्यों को टीवी पर दूर से देखकर जब मुझे ऐसा लगता है कि मैं अपना मानसिक संतुलन खो बैठूंगा तो उन संवेदनशील डॉक्टरों पर क्या गुजरेगी जो पल-पल उसी हालात में जी रहे हैैं।


इस हालात में डॉक्टर की आंखों के आंसू दुनिया के सामने आ गए, यह अच्छा ही हुआ। लेकिन शिक्षकों की आंखों में भी आंसू हैं जो दुनिया के सामने शायद ही आए। जीवन निर्माता भी अपने प्रोफेशन से गहरे असंतोष में है क्योंकि वे विद्यार्थियों के जीवन का निर्माण नहीं कर पा रहे बल्कि अनावश्यक सूचनाएं भेजने और अन्य कार्यों में लगा दिये गए हैं।


_विश्व गुरु का सपना देखने वाले भारत ने जीवन बचाने वाले डॉक्टरों को और जीवन बनाने वाले शिक्षकों को एक ऐसी व्यवस्था दी है जिसमें वे अपने धर्म का निर्वाह तक नहीं कर पा रहे।


सांत्वना का मीठा शब्द और झूठा सम्मान कभी भी वह तृप्ति नहीं दे सकता जो सत्य दे देता है। रोहित के शब्द बहुत दूर तक जाने वाले हैं कि - "देश को मंदिर मस्जिद की नहीं बल्कि अस्पताल और स्कूल की जरूरत है।" -इन शब्दों से सहमति व्यक्त करते हुए मैं शिक्षाजगत के अपने 25 साल के अनुभव के आधार पर इतना अवश्य जोड़ना चाहूंगा कि अस्पताल और स्कूल से भी ज्यादा देश को योग्य डॉक्टरों और योग्य शिक्षकों की जरूरत है। सिर्फ बेड बढ़ा देने से मरीज सुरक्षित नहीं होता और सिर्फ भवन खड़ा कर देने से विद्यार्थी योग्य नहीं होता।


बांट देगी सियासत हमें दो तरफ


हम जो मंदिर मस्जिद बनाते रहे


पीने का जिनको सलीका न था


मैकदे उनकी किस्मत में आते रहे


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे की *"सत्य की उद्घोषणा करके जाने वाली दिवंगत आत्मा को हार्दिक श्रद्धांजलि"*🙏🌹