कठिनतम वक्त के साथी
May 3, 2021संवाद
"कठिनतम वक्त के साथी"
सांस तोड़ते इंसानों को देखकर हमारी रूह कांप जाती है और टीवी बंद कर देना पड़ता है। किंतु कुछ ऐसे लोग भी हैं जो सांस छोड़ चुके इंसानों के पास पहुंच जाते हैं और उनकी अंतिम विदाई की रस्म को ससम्मान पूरा करवाते हैं।
जिस निष्ठुर समय में सगे भी शवों को छोड़ कर भाग जा रहे हैं, उस कठिन समय में जोधपुर के मुकेश गोदावत पीपीई किट पहने हुए तुरंत पहुंच जाते हैं और एंबुलेंस से मृतक को श्मशान घाट ले जाकर अंतिम संस्कार पूर्ण करवाते हैं। अपनों को खो चुके परिजन जब निस्सहाय अवस्था में कोरोना के भय से बदहवास रहते हैं,उस समय मुकेश श्मशान घाट पर नि:स्वार्थ भाव से पहुंचकर अंत्येष्टि के लिए लकड़ियां जुटाने और पूजा सामग्री की व्यवस्था करने के काम में जुट जाते हैं। समस्त प्रोटोकॉल का पालन करते हुए इस निर्दयी अप्रैल के 1 महीने में 48 अंत्येष्टि संस्कार में वे मददगार बने।
पेशे से इलेक्ट्रिक डेकोरेशन का छोटा काम करने वाले इस शख्स ने अपनी जिंदगी को कितनी बड़ी सार्थकता दी है।उनके इतने बड़े इरादे को देखकर मुझे महात्मा बुद्ध का वह प्रयोग याद आता है जिसमें वे अपने शिष्यों को 3 महीने तक श्मशान घाट पर जाकर मृत शरीर को जलते देखने के लिए कहते थे। कई शिष्य 3 महीने के प्रयोग के बाद सत्य ज्ञान को उपलब्ध हो जाते थे।
मुकेश तो अपने दोस्त ईश्वर के साथ 6 साल से मृत शरीर को लाने और जलाने का पूरा काम कर भी रहे हैं और देख भी रहे हैं। अपने काम की शुरुआत वे महादेव के मंदिर में दर्शन करने के बाद करते हैं।
एक फोन कॉल पर सहायता की जगह पर पहुंच जाने वाले इस शख्स ने इस बार तो एक दिन में ग्यारह अंत्येष्टि संस्कार को संपन्न कराया ; क्या ऐसा शख्स सत्य-ज्ञान को उपलब्ध नहीं हुआ होगा?
हमारे पास वो आंखें नहीं हैं जो ऐसे साधारण शख्स की असाधारणता को देख सकें और पहचान सकें। हमारी आंखें तो धन,पद,प्रतिष्ठा के तराजू पर ही किसी को तौलती हैं जो शवों को दफनाने की रीति-नीति कम जानते हैं ,लाशों के ढेर पर राजनीति करना ज्यादा।
यदि आज किसी बुद्धपुरुष से पूछेंगे तो वे बताएंगे कि असली ज्ञान तो इस व्यक्ति को उपलब्ध हुआ है जो इस संकट काल में निरर्थक सी लगने वाली जिंदगी को इतनी बड़ी सार्थकता प्रदान कर रहा है।-
अब राम आएंगे दुनिया में न रहमान आएंगे
वक्त पर इंसान ही इंसानों के काम आएंगे।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डा.सर्वजीत दुबे🙏🌹