संवाद


"हिंसा को ऑक्सीजन


प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों का ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ना हमारी भौतिक-व्यवस्था की कमियों की ओर इशारा करता है तो दूसरी ओर चुनाव परिणाम के बाद राजनीतिक हिंसा हमारी मानसिक-व्यवस्था की कमियों की ओर। "कोढ़ में खाज" की तरह अव्यवस्था और हिंसा हमारे राष्ट्रीय जीवन को गहरे से गहरे खतरे की ओर ले जा रहे हैं। हम भारत के लोग मानवता और राष्ट्रीयता को शर्मसार करने वाले कृत्य की ओर क्यों बढ़ रहे हैं?


इसके मूल में अहंकार है-


पकी खेती देखी के ,गरब किया किसान


अजहूं झोला बहुत हैं ,घर आवे तक जान।


एक तरफ विशेषज्ञों की सलाह की अनदेखी की जांच कर लीजिए तो आज की अव्यवस्था का बीज वहां मिल जाएगा दूसरी तरफ


रैलियों में दिए गए भाषणों की जांच कर लीजिए तो आज की राजनीतिक हिंसा का बीज वहां मिल जाएगा- बोए पेड़ बबूल के , आम कहां से होय.


यदि हिंसक आचरण को रोकना हो तो हमें हिंसक वचन या भाषण को रोकना होगा। और हिंसक भाषण को रोकना हो तो मन को अहिंसक और प्रेमपूर्ण बनाना होगा। मन,वचन,कर्म में अहिंसा लाने के लिए अहंकार को गलाना होगा।


इस विकट परिस्थिति में मुझे एक मार्ग दिखाने वाला दृष्टांत याद आ रहा है-रोहिणी नदी के जल को लेकर शाक्य और कोलिय जनपद के राजा आमने-सामने युद्ध के लिए खड़े थे। अचानक भगवान बुद्ध का आगमन हुआ और दोनों राजाओं ने अपनी तलवारें छोड़कर उन्हें प्रणाम किया। बुद्ध ने दोनों से पूछा कि सेनाओं के साथ आप लोग यहां क्यों खड़े हैं? जवाब मिला -युद्ध के लिए। तब बुद्ध ने पूछा- युद्ध किसके लिए। जवाब मिला- पानी के लिए। बुद्ध ने कहा - जल तो जीवन देता है जबकि युद्ध जीवन लेता है। जल के लिए युद्ध कैसे हो सकता है?


अंत में मूल कारण पता चला कि गर्मी के दिनों में रोहिणी नदी में अल्प जल बचा है तो दोनों राजा "पहले मैं जल लूंगा" इस बात पर लड़ने को आतुर थे। बुद्ध ने कहा कि राजन! अहंकार समस्या का कारण है,जल नहीं।अहंकार हटाकर आवश्यकतानुसार जल ले लो। बुद्ध जैसी दिव्य आत्मा ने अहंकार से पीड़ित दोनों राजाओं को कल्याण का मार्ग दिखा दिया।


अहंकार और संकीर्ण दृष्टि से कभी किसी का भला नहीं हुआ। We,the people of India आत्मवान और दूरदर्शितापूर्ण नेतृत्व की राह देख रहे हैं।- "संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्".


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹