जीवन एक संघर्ष है जो मानव-मन के भीतर चल रहा है देव और दानव का,राम और रावण का।
May 7, 2021संवाद
हे मानव!देव भी तुम्ही हो और दानव भी"
किसकी सांसे कब अटकने लगेगी और कब रुक जाएगी आज कोई नहीं जानता। महामारी की इस कारुणिक परिस्थिति में कुछ लोग अपना सब कुछ परोपकाराय दान कर दे रहे हैं तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आपदा को धन कमाने का अवसर बना रहे हैं।
चारों ओर घटती मृत्यु की इस परिस्थिति में लुटानेवाले और लूटनेवाले इन दो विपरीत मन:स्थितियों को देखकर मैं गहरे सोच में पड़ गया। आखिर ऐसा क्यों?
(१) समाजसेवी-कलाकार सोनू सूद ने ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे एक मरीज को सिलेंडर की व्यवस्था कराई। किंतु समय पर ऑक्सीजन सिलिंडर नहीं पहुंच सका और उस महिला ने जिसके जुड़वे बच्चे गर्भ में थे, दम तोड़ दिया। उस महिला के पति ने सोनू सूद को फोन करके कहा कि आपने बहुत प्रयास किया किंतु मेरी किस्मत खराब थी। लेकिन अब मैं आपके समाज-सेवा के काम में हाथ बंटाना चाहता हूं।
सोनू सूद ने कहा कि अभी आपकी मानसिक स्थिति इस लायक नहीं है, पहले आप अपने दुख को झेल लें। अपनी पत्नी और होने वाले जुड़वा बच्चे को खो चुके उस शख्स ने कहा कि ऑक्सीजन की कमी से उजड़ चुकी मेरी दुनिया में मेरे जिंदा रहने का एकमात्र सहारा अब कोई बन सकता है तो वह है-समाज-सेवा; यही प्रेरणा मैंने आपके जीवन से पाई।
(२) दूसरी ओर कुछ ऐसे भी गैंग पकड़े गए हैं जो नकली दवा और इंजेक्शन बनाने का धंधा करते थे और जिसे कई गुना ज्यादा दाम पर बेच रहे थे। विपत्ति के इस काल में मजबूर लोगों से करोड़ों की कमाई कर चुके इस धंधे में चिकित्सा-सेवा से लेकर सभ्य तबके के लोग शामिल थे।
इन्होंने इतना भी नहीं सोचा कि आसानी से बचाए जाने वाला मरीज भी नकली दवाई के कारण दम तोड़ देगा। हो सकता है वह नकली दवा इन्हीं के किसी रिश्तेदार तक पहुंच जाए।
जब मृत्यु का तांडव चल रहा है तो एक तरफ कुछ लोग अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर ईश्वर को जवाब देने के लिए पुण्य कमा रहे हैं।
दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी अंतरात्मा मर चुकी हैं। उनके लिए ईश्वर तो होता ही नहीं ,जो पुण्य- पाप का हिसाब रखे। वे पाप की कमाई से अपना घर भर रहे हैं। ऐसे लोगों के लिए जो भी है यही जीवन है और इसे जितना भोगा जा सके भोग लो; इसके लिए किसी की जेब काटनी हो या हत्या करनी हो, कोई बड़ी बात नहीं।
स्वामी विवेकानंद से एक बार किसी ने पूछा- *जीवन क्या है?उनका जवाब था- "जीवन एक संघर्ष है जो मानव-मन के भीतर चल रहा है देव और दानव का,राम और रावण का।"
महामारी ने तो एक विशेष अवसर दिया है जिसमें हम अपना देवत्व भी जगा सकते हैं और दानवत्व भी; रामत्व भी उभार सकते हैं और रावणत्व भी। यह सब प्राप्त शिक्षा और संस्कार पर निर्भर हैं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹