संवाद


"निराशावाद बनाम आशावाद"


प्रश्न:मन निराशा के गहरे भंवर में डूबता जा रहा है,इसमें आशा कोई कैसे रखे? कोरोना की पहली लहर ने ही घायल कर दिया था,दूसरी लहर ने तो मार दिया अब तीसरी लहर में क्या होगा?


प्रिय विद्यार्थी!पश्चिमी मन ने विज्ञान के माध्यम से मैटर (पदार्थ)पर बहुत गहरा काम किया,उतना ही गहरा काम हमारे ऋषियों ने मन पर किया था। मन हमेशा अतियों में डोलता है। मन के अनुसार परिणाम आ जाए तो अहंकार फूले नहीं समाता और मन के विपरीत होने लगे तो आत्महत्या पर उतारू हो जाता है।


पश्चिमी विचारक का मानना था कि कर्म करने पर सब कुछ बदल जाएगा किंतु पूरब के द्रष्टाऋषि का कहना था कि "होंइहें वही जो राम रची राखा।"


कर्मवाद पर गहरी आस्था होने के कारण पश्चिम ने अपने कठिन परिश्रम से बहुत कुछ बदल दिया फिर भी इस महामारी के सामने वे भी विवश और लाचार हो गए। self(अहं) पर ज्यादा जोर देने के कारण आत्महत्या पश्चिम में बहुत ज्यादा होने लगी।


हमारी संस्कृति भाग्यवाद पर जोर देती हैं। सेल्फ नहीं समर्पण यहां का जीवन-सूत्र है। अतः कठिनतम समय में भी यहां पर विक्षिप्तता और आत्महत्या की संख्या पश्चिम की अपेक्षा बहुत कम रहती है।


चारों तरफ से मौत की खबरें आने के कारण निराशा स्वाभाविक है। अतः हर शख्स का मन निराशा के गहरे भंवर में डूबता जा रहा है किंतु जिनकी श्रद्धा बहुत गहरी हैं वे कहते हैं कि "जाको राखे साइयां मार सकै ना कोय".


अतः भगवान पर अटूट श्रद्धा से आशा की किरण का जन्म हो जाता है।


किंतु ध्यान में रखने की बात यह है कि श्रद्धा अंधविश्वास में नहीं बदले। अन्यथा गुजरात में इतनी बड़ी संख्या में बिना मास्क व दूरी के मंदिर में जल चढ़ाने लोग कैसे चल देते? रैलियों और मेलों में इतने लोग कैसे जुटते?


जो भगवान हमारी रक्षा करेगा वही भगवान डॉक्टर के रूप में वैक्सिन बना रहा है तथा कई रूपों में सहयोग का हाथ बढ़ा रहा है और सारी सावधानियां बरतने की सलाह दे रहा है।


ज्ञानीजन कहते हैं कि भंवर में डूबते जाओ तो सबसे निचले हिस्से के पतला होने के कारण वहां से व्यक्ति निकल जाता है। अतः निराशा से लड़ने की जरूरत नहीं है,उसमें गोते लगाते जाने की जरूरत है। किंतु साथ में भगवान पर भरोसा बनाए रहने की जरूरत है-


"मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे


बाकी न मैं रहूं , न मेरी आरजू रहे।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹