संवाद


"न जीवन बच रहा,न जीवन-मूल्य"


"बिहार के गांवों में दाह-संस्कार के लिए लकड़ियां नहीं मिल रही, इतनी ज्यादा संख्या में लोग मर रहे हैं"-चार दिन पहले फोन पर यह सूचना मुझे अपने भतीजे से मिली। इस बात पर मुझे पूरा यकीन नहीं हो रहा था।


कल समाचार-पत्र में यह खबर आई कि *दाह-संस्कार के पैसे के अभाव में बेटी ने मां का शव दफनाया। चार दिन पहले पिता भी कोरोना से चल बसे थे। खेत में मां को दफनाते हुए बेटी की तस्वीर को समाचार-पत्र में देखकर हृदय कांप उठा किंतु उसके बगल में यूपी में पंचायत अध्यक्ष पद के लिए एक वोट एक करोड़ रुपए का", यह खबर थी, जिसे पढ़कर मस्तिष्क सुन्न हो गया।


एक तरफ किसी गरीब को अपने मां-बाप की अंतिम संस्कार की रीति को भी करने की सुविधा नहीं बची। सहायता को न कोई पंच आया और न कोई सरपंच। दूसरी तरफ स्थानीय स्तर के पंचायत चुनाव में भी करोड़ों के वारे-न्यारे हो रहे हैं।


नकली दवाओं के व्यापार में तथा ऑक्सीजन की कालाबाजारी में पकड़े गए एक *डॉक्टर से पूछताछ की गई तो पता चला कि जमीन-जायदाद बेचकर एक करोड़ रुपया खर्चा करके वह डॉक्टर बना है। अतः मानवीय-मूल्य से पहले डॉक्टर बनने के लिए दिए गए मूल्य की वसूली करनी जरूरी है।


स्थानीय स्तर के चुनाव में भी जहां करोड़ों रुपए इन्वेस्ट किए जाते हों, वहां किस प्रकार का जनप्रतिनिधि होगा और कैसा जनकल्याण होगा ,भगवान ही बेहतर बता सकते हैं।


अतः लोककल्याणकारी राज्य भारत में ऑक्सीजन की कमी से हजारों के दम तोड़ देने पर भी सत्ता निष्क्रिय बनी रहती है और सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ता है; पर उसी समय में पंचायत अध्यक्ष पद पाने के लिए करोड़ों की सौदेबाजी करने में वह सक्रिय हो जाती है।


सत्ता के शीर्ष नेता से लेकर निचले स्तर का कार्यकर्ता तक जब बेचने और खरीदने की वस्तु बन जाएंगे तो लोकतंत्र और धनतंत्र में अंतर कहां रहा? तभी तो किसी कवि के हृदय से निकल पड़ा-


"न कोई गण है , न कोई तंत्र है।


यह आदमी का आदमी के विरुद्ध खुला सा षड्यंत्र है।।"


*महामारी ने जितनी निष्ठुरता दिखाई है, उससे कम निष्ठुरता राजनीति ने नहीं दिखाई है। अंतर सिर्फ इतना है कि महामारी ने जहां जीवन निगल लिए,वहीं राजनीति ने जीवन-मूल्य।-


"दरख़्तों से दूर चिड़ियों का निवास हो गया


व्यवस्था से हर शख्स का विश्वास खो गया।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे