संवाद


" विपत्ति और जागरण"


राष्ट्रकवि दिनकर कहते हैं कि विपत्ति जागरण का बहुत अच्छा अवसर प्रदान करती है-


"सच है विपत्ति जब आती है


सोते से हमें जगाती है ।"


हर पल चौकन्ना और सावधान रहना पड़ता है अन्यथा अपना अस्तित्व खतरे में पड़ने लगता है। वनवास औरअज्ञातवास में पांडवों ने अपने आपको अलग-थलग रखकर और वेश बदलकर दुर्योधन की गुप्तचर सेना से बचाया। कई प्रकार की सिद्धियां उन्होंने प्राप्त की जो महाभारत युद्ध के दौरान बहुत काम आईं।


राम,सीता,लक्ष्मण को जंगल मेंअनेक प्रकार के कष्टों को सहना पड़ा लेकिन व्यक्तित्व इतना निखरा कि वे सभी हमारे आदर्श बन गए।


विपत्तियां हमें सोने नहीं देतीं। जो सतत जगा रहता है उसमें कई प्रकार के सद्गुण आने लगते हैं। कई प्रकार की दवाइयों की खोज और वैक्सीन का निर्माण इसी जागरण के फल हैं। अहर्निश सेवा का यज्ञ जो चल रहा है वह जागे हुए लोग ही कर रहे हैं -


सत्पथ की ओर लगाकर ही ,


जाती हैं हमें जगाकर ही।


लेकिन इस सारी मेहनत पर कुछ सोए हुए लोग पानी फेर दे रहे हैं। बिना मास्क व दूरी के भीड़-भाड़ वाले स्थान में जाकर वे स्वयं तो संक्रमित हो ही रहे हैं; साथ ही अपने परिजनों को भी काल के गाल में धकेल रहे हैं। मूर्छा इतनी गहरी है कि इस महाविपत्ति के काल में भी कुछ लोग मुनाफा कमाने के धंधे चला रहे हैं। ऐसे लोगों को देखकर एक प्रश्न मन में उठता है कि जिन्हें मौत नहीं जगा सकती ,उन्हें और कौन जगा सकता है?


महामारी रेड अलर्ट-जन अनुशासन पखवाड़ा के दौरान जनता घरों में रहे और महामारी से बचे इस उद्देश्य के लिए बहुत बड़ी संख्या में प्रशासन और पुलिस के लोग दिन-रात सड़क पर खड़े हैं। क्या यह नागरिकों का धर्म नहीं बनता कि वे स्वयं ही सरकार के दिशा-निर्देशों का पालन करें? सरकार के पास सीमित संसाधन होते हैं ,जिससे इतनी बड़ी जनसंख्या की देखभाल सामान्य दिनों में भी नहीं की जा सकती। फिर यह तो महाविपत्ति का काल है, जिसमें प्रत्येक जन का अनुशासन और जागरण ही संक्रमण को नियंत्रित कर मौतों को कम कर सकती हैं।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹