षडजीव निकाय
May 12, 2021संवाद
"मानो तो मैं गंगा मां हूं, न मानो तो बहता पानी"
ऋग्वेद में जल को देवता माना गया है तो शतपथ ब्राह्मण में "आपो वै प्राण:" कहकर जल को प्राण माना गया है।महावीर ने "षडजीव निकाय" के अंतर्गत 6 चीजों में जीवन माना था, उसमें जल भी एक है।
"जल जीवन है"-ज्ञानी लोग बहुत पहले से जानते थे, हमें तो अब समझ में आया है, लेकिन वह भी ठीक से नहीं। अभी तो अधिकतर लोगों के लिए यह एक नारा मात्र है। अन्यथा एक-एक बूंद को तरसती धरती पर जलाशयों और नदी के साथ वैसा व्यवहार नहीं किया जाता,जैसा हुआ है।
लेकिन नदियों में गंगा नदी तो हमारे लिए पवित्रतम है क्योंकि भागीरथी प्रयास से स्वर्ग से उतारी गई है-
"जो स्वर्ग ने दी धरती को,
मैं हूं प्यार की वहीं निशानी।"
मैथिली कवि विद्यापति ने तो "जननी" कहते हुए गंगा से क्षमा मांगी हैं कि स्नान करते वक्त पैर का स्पर्श आपके जल से होता है-
एक अपराध छेमब मोर जानी,
परसल माए पाए तुअ पानी।
और गंगा में स्नान की महिमा को तो उन्होंने जप,तप, योग ,ध्यान से भी बड़ा बताया है -
कि करब जप तप जोग ध्याने ,
जनम कृतार्थ एक ही सनाने।
गंगा किनारे मेरा घर है और मेरे गांव में कोई भी चप्पल पहनकर गंगा के किनारे नहीं जाता। उस गंगा में संक्रमित शवों को देखकर मेरी अंतरात्मा कराह उठी। जिस पवित्र जलधारा में अस्थियों का विसर्जन करके व्यक्ति मुक्ति की कामना पूरी होते हुए देखता है, उसी जलधारा में कोई अपने परिजनों के शवों को किस मजबूरी में डाल रहा है? जिस इलाके में परंपरा इतनी हावी है कि अंतिम संस्कार के लिए लोग अपने जमीन- जायदाद को बेचकर भी शास्त्रोक्त विधि से पूरा विधि-विधान संपन्न करते हैं, ऐसे धर्मभीरु लोग किस कारण से इस प्रकार के कृत्य के लिए विवश हुए हैं? कैसी भी मजबूरी हो, यह अक्षम्य अपराध है।
वैज्ञानिक चेतना वाले लोगों द्वारा उस समय भी बड़ी चिंता हमारी उस मूढता पर व्यक्त की गई थी जब हरिद्वार के कुंभ में पाप-प्रक्षालिनी गंगा की धारा में डुबकी लगाने हेतु लाखों लोग सारे खतरे को दरकिनार करते हुए आस्था के नाम पर एकत्रित हो गए थे। भारी भीड़ के कारण इससे एक तरफ संक्रमण फैला और दूसरी तरफ गंगा की धारा में डुबकी लगाने से वह संक्रमण पवित्र धारा को अपवित्र करने के साथ संक्रमित भी कर गया।
वैज्ञानिक चेतना का विकास हमारे मौलिक कर्तव्यों में से एक प्रमुख कर्तव्य है जिसके बिना इस महामारी की विभीषिका को कम नहीं किया जा सकता। किसी भी मजबूरी की आड़ में अक्षम्य अपराध को जायज नहीं ठहराया जा सकता और आस्था के नाम पर अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।
शिक्षालयों की मुख्य जिम्मेदारी उस बोथ को जागृत करने की है जिससे इस महामारी की विभीषिका को कम से कम किया जा सके। जिस प्रकार से राजस्थान सरकार ने संक्रमित शवों को कोरोना प्रोटोकॉल के तहत प्रशासन द्वारा ही अंतिम संस्कार की व्यवस्था को लागू किया है, उसी प्रकार अन्य राज्यों को भी करना चाहिए।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹