अंधेरों को सुबह कैसे कहूं?
May 18, 2021संवाद
अंधेरों को सुबह कैसे कहूं?
सबसे बड़ा झूठ आंकड़ों का झूठ होता है।महामारी का सबसे बड़ा सबक यह है कि देश कागजों में चल रहा है और आंकड़ों की बाजीगरी से हवा में अब तक उड़ रहा था।
दूसरी लहर के बाद पैदा हुए हालात ने देश को गहरी निराशा में धकेल दिया है। जिनकी आंखों में गहरे अंधेरों ने अपना घर बना लिया है,उनके सामने प्रकाश की बात करने वाले सबसे बड़े झूठे और दुश्मन प्रतीत हो रहे हैं।
संक्रमण से मर रहे लोगों को डॉक्टर और दवाई चाहिए ; भूख-प्यास से तड़प रहे लोगों को अन्न और पानी चाहिए। मृत आत्माओं को अंतिम संस्कार की उचित व्यवस्था चाहिए। सरकारी प्रयास ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है। ऐसी परिस्थिति में बड़े-बड़े दावे जले पर नमक छिड़कने के समान है।
वास्तविक तथ्य और सत्य सबकी आंखों के सामने आने चाहिए और सबके द्वारा उसके प्रति स्वीकार भाव भी होना चाहिए ताकि समाधान की ओर कदम बढ़ाया जा सके।
किंतु आशावाद की इतनी ख़राब बीमारी हमारे मनों में घुल चुकी है कि सच बोलने वाले को हम या तो निराशावादी कहकर बाहर निकाल देते हैं अथवा उसे झूठा कहकर गिरफ्तार कर जेल के अंदर डाल देते हैं।
हम सबको यह समझना होगा कि आशावाद हमें झूठी नींद में सुला दे रहा है। नींद में यदि हम स्वर्ग में पहुंच भी जाएं तो जब आंख खुलेगी तो पाएंगे कि चारों तरफ नर्क ही नर्क हैं।
इससे अच्छा तो वह निराशावाद है जो समस्याएं तो गिना रहा है और दिखा रहा है। शोध करने वाले बता रहे हैं कि आने वाले दिनों में हालात और बद से बदतर होते जाएंगे क्योंकि हम सच का सामना करना ही नहीं चाहते।
इतनी खराब और भयावह हालात के बाद भी किसी का हृदय-परिवर्तन नहीं हो रहा। कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने लाशों के ढेर को देखकर युद्ध की निरर्थकता समझी और बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गया। राजतंत्र में जो संभव हो पाया,वह आज प्रजातंत्र में दुर्लभ क्यों है? क्योंकि कोई भी अंतरात्मा की आवाज नहीं सुन रहा है और जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। काश! कोई लाशों के ढेर को देखकर आज झूठे आश्वासनों की निरर्थकता समझ पाता और राजधर्म में दीक्षित हो पाता।
हम सोए हुए लोग हैं और नींद टूटते ही जाति,धर्म,क्षेत्र,दल व विचारधारा आदि अनेक प्रकार की शराबें पी लेते हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा नशा आशावाद रूपी नई मदिरा में है। शेक्सपियर ने कहा था कि सभी को हमेशा-हमेशा के लिए मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। यदि भारत का गहरा अनुभव होता तो वह जरूर जोड़ देता 'भारत को छोड़कर'। क्योंकि भारत में भवन बनाकर अस्पताल खोलने का दावा कर दिया जाता है और शिलापट्ट पर उद्घाटनकर्ता का नाम भी अंकित हो जाता है; जबकि वहां न डॉक्टर हैं और न दवाई।
डॉक्टर, दवा व ऑक्सीजन को ढूंढता हुआ तथा तड़प-तड़प कर मरता हुआ नागरिक यदि निराशा में है तो मैं आशावादी कैसे हो सकता हूं? -
"सूरज ने इतना झुलसाया मुझे
अंधेरे मुझे रास आने लगे हैं।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹