एक डॉक्टर की मौत
May 20, 2021संवाद
"एक डॉक्टर की मौत"
महामारी की दूसरी लहर ने यह एहसास कराया कि यमराज और मरीज के बीच में डॉक्टर खड़ा है। भाग्यवान निकले वे लोग जिन्हें समय पर डॉक्टर और चिकित्सा सुविधाएं मिल गईं। काल के गाल में से निकल कर उन मरीजों ने एक ही अल्फाज बोला-हां! मैंने भगवान को देखा है।
कितनी मुश्किल से एक डॉक्टर तैयार किया जाता है और कितनी कठिन पढ़ाई पास करके वे इस मुकाम तक पहुंचते हैं। कितना कठिन होता है दिन-रात रोगियों के बीच में रहना; फिर भी वे जब आते हैं तो मुस्कुराते हुए अपने मरीजों से दोस्त की तरह हालचाल पूछते हैं। दर्द से कराहते मरीजों द्वारा निर्मित नकारात्मक वातावरण को वे अपनी उपस्थिति से सकारात्मक बना देते हैं। जितना ज्यादा उनका अनुभव बढ़ता जाता है उतना ही ज्यादा उनकी दक्षता आसमान छूने लगती है-old is gold।
खासकर कोरोना काल में जिस जगह पर वायरस की डेंसिटी सबसे ज्यादा है, उस जगह पर अपने प्राणों की बाजी लगाकर हजारों डॉक्टरों ने लाखों मरीजों को भला-चंगा कर अपने घर भेज दिया। किंतु कई डॉक्टर इस प्रयास में अपनी जान गवां बैठे।
कई डॉक्टर दिन-रात मरीजों की *सेवा करने के साथ लोगों को इस महामारी से जागरूक करने में अतिरिक्त श्रम कर रहे थे। उन्हें सुनकर अपने शरीर के बारे में जितनी ज्यादा जानकारी मुझे मिली, उतनी ज्यादा जानकारी मैं आज तक किताबों से नहीं ग्रहण कर पाया था। टीवी स्क्रीन पर इन डॉक्टरों को सुनते-सुनते ना जानें कब इनसे इतना गहरा लगाव हो गया कि वे परिवार की सदस्य की तरह लगने लगे। आज जब उन डॉक्टरों में से एक वरिष्ठतम डॉ के के अग्रवाल के कोरोना से निधन की खबर दोस्त ने फोन करके बताई तो विश्वास करना मुश्किल हो रहा था। ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहते हुए उन्होंने अंतिम वीडियो संदेश दिया कि- "मैं डॉ के के अग्रवाल नहीं, कोरोना से लड़ रहे डॉक्टरों का प्रतिनिधि हूं।मेरे जैसे लोग ऑक्सीजन पर भी क्लासेज लेंगे और लोगों को बचाने की कोशिश करेंगे । शो मस्ट गो ऑन,पिक्चर अभी बाकी है।"
उनके निधन की खबर और अंतिम संदेश को पढ़कर "मृत्योर्मा अमृतम् गमय" मेरे कानों में गूंजने लगा-
"व्रत का अंतिम मोल चुकाते हुए न जो रोते हैं,
पूर्ण काम जीवन में एकाकार वही होते हैं।"
क्या सचमुच डॉक्टर की मौत हो गई अथवा अपने कर्तव्य की बलिवेदी पर शहीद होकर उन्होंने अमरत्व प्राप्त कर लिया?
ऐसे समय में जब एक तरफ इंसान बेमौत मर रहा हो और दूसरी तरफ मूल्य; उस समय में डॉक्टर मरीज के लिए अंतिम सांस तक लगे रहकर इंसानियत और मानवीय-मूल्य को एक नई ऊंचाइयां दे गया।
एक डॉक्टर की मौत फिल्म में मैंने देखा था कि जब डॉक्टर कुछ शोध करना चाहता है और व्यवस्था के कारण नहीं कर पाता तब उसकी मौत होती हैं। आज कई वैज्ञानिक और डॉक्टर जब देखते हैं कि उनकी सलाह को दरकिनार कर लाखों लोगों को मौत के गाल में धकेला जा रहा है तब उन्हें लगता है कि वे मर गए।
जन्म के साथ ही मरण निश्चित हो जाता है किंतु जो बीच का समय सार्थक कर जाते हैं,उनके लिए मृत्यु अमृत का पैगाम लेकर आती है। महामारी के इस काल में महाजीवन का संदेश देने वालों ने देश को "शहीद" शब्द पर पुनर्विचार का एक मैसेज भी भेजा है-क्या सिर्फ युद्ध में प्राण गंवाने वाले ही शहीद होते हैं?
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे कर्तव्य की बलिवेदी पर अंतिम सांस तक लड़ते हुए प्राण गंवाने वाले शहीदों को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि🙏🌹