भय का विश्लेषण
May 23, 2021संवाद
"भय का विश्लेषण"
अनेक प्रकार के भयों ने हमें आज घेर लिया है। कोरोना के बाद ब्लैक-फंगस का भय, प्रियजन के बिछड़ने का भय, आर्थिक संकट का भय, अकेलेपन का भय और मृत्यु का भय; इन सब ने मिलकर हमारे विल-पावर के साथ इम्यूनिटी-पावर को भी प्रभावित किया है। सिर्फ दवाई, अन्न और फल से ही इम्यूनिटी- पावर पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं हो सकता क्योंकि मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।
किंतु मन तो आज दिन-रात कंप रहा है क्योंकि डरावनी खबरें आ रही हैं और अनिष्ट की आशंका बढ़ती जा रही है।
डरावनी परिस्थिति व कम्पायमान मन:स्थिति में भय को समझना जरुरी है।
हमारे हृदय में आठ प्रकार के भाव प्रकृति-प्रदत हैं,जिनमें प्रेम,घृणा,क्रोध,भय इत्यादि प्रमुख हैं। इनको स्थायी-भाव कहते हैं।
आज महामारी के समय में सबसे ज्यादा प्रबल भय नामक स्थायीभाव हो गया है। भय के कारण हम बाहर नहीं निकल रहे हैं,इस सीमित मात्रा में यह हमें सुरक्षा प्रदान करता हैं। किंतु भय के असीमित मात्रा में बढ़ जाने के कारण हम डिप्रेशन का शिकार होते जा रहे हैं।
*भय एक उर्जा है। जिस प्रकार से क्रोध में मनुष्य अपनी शक्ति से 5 गुना ज्यादा बड़ा पत्थर को उठा सकता है, उसी प्रकार से किसी हिंसक जानवर के द्वारा पीछा किए जाने पर भय के कारण मनुष्य अपनी शक्ति से 5 गुना ज्यादा तेजी से दौड़ सकता है। इतनी अद्भुत-ऊर्जा भय है जिसको या तो दबाने की कोशिश की जा रही हैं अथवा जीतने की। दबाने की कोशिश में भय अवचेतन में प्रवेश कर जा रहा है और जीतने की कोशिश में व्यक्ति टूटता जा रहा है। जरूरत है इसको समझने की-
जो अंतर की आग , अधर पर आकर वही पराग बन गई
अवचेतन में छिपी घृणा ही , चेतन का अनुराग बन गई।
आग के प्रति और सांप के प्रति हम भी बच्चों को डरना सिखाते हैं ताकि वह आग में हाथ न डाल दे और सांप को पकड़ न ले।
इसी प्रकार से महामारी से डरना जरूरी है किंतु मन वास्तविक भय के साथ कई प्रकार की कल्पनाएं कर लेता है जो कि डर को असहनीय बना देता है। पहली लहर में एक व्यापारी ने अपने बीवी-बच्चों सहित आत्महत्या कर ली क्योंकि कर्ज के बहुत अधिक बढ़ जाने का काल्पनिक-भय उसे सता रहा था। जबकि लॉकडाउन हटने के कुछ दिनों के बाद व्यवसाय की स्थिति अच्छी हो गई।
मनुष्य की सीमित औकात है और उतना ही भार अपने सर के ऊपर लेना चाहिए ; बाकी परमात्मा को सौंपने की कला भी आनी चाहिए - जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए। अन्यथा डिप्रेशन और आत्महत्या बढ़ती जाएगी।
अतः महामारी का वास्तविक-भय जरूरी है ताकि हम डबल-मास्क पहन सकें,सामाजिक दूरी रख सकें,भीड़ भाड़ में न जाएं। किंतु महामारी के काल्पनिक-भय से बचना भी जरुरी है ताकि हमारा संतुलन न बिगड़ जाए और हम धैर्य न खो दें-
"स्व की चरमासक्ति स्वयं से छलकर परम विराग बन गई
सप्तम स्वर तक पहुंच भैरवी ,कोमल राग बिहाग बन गई।"
हमारी सजगता पर निर्भर करता है कि भय नामक ऊर्जा हमारा कल्याण करेगी या अकल्याण।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹