एलोपैथ बनाम आयुर्वेद
May 26, 2021संवाद
"एलोपैथ बनाम आयुर्वेद"
चिकित्सकों के साथ चिकित्सा उपकरणों की भारी कमी के कारण कई लोग कोरोना के शिकार हो गए। दूरदराज के क्षेत्रों में लाखों-करोड़ो की लागत से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बना देने पर भी चिकित्सक के अभाव में वे बंद पड़े मिल रहे हैं।
जिस प्रकार टीका के अभाव में टीका-उत्सव कारगर नहीं हो सका,उसी प्रकार "जहां बीमार,वहीं उपचार" का मंत्र चिकित्साकर्मी के अभाव में कभी भी कारगर नहीं हो सकता।
योग गुरु बाबा रामदेव के बयान को लेकर चिकित्सा-पद्धति के संबंध में एक बहस छिड़ गई है। इस बहस के विवादित पहलू के साथ कई सार्थक पहलू भी हैं। इसके सार्थक पहलू के ऊपर गंभीर विचार-विमर्श हो और उसकी गवेषणा को आगे बढ़ाया जाए तो यह वरदान साबित हो सकता है।
बीमारियों की रोकथाम में एलोपैथी के योगदान को पूरा विश्व मानता है किंतु आयुर्वेद की संभावना से भी इनकार करना बुद्धिमानी नहीं होगी। दूसरी तरफ एलोपैथी दवाओं के साइड इफेक्ट सामने आ रहे हैं तो आयुर्वेदिक दवाओं के इमरजेंसी काल में प्रभाव-सीमितता भी सबको मालूम है।
आज भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले विशाल देश में परंपरागत तथा आधुनिक सभी चिकित्सा पद्धतियों पर ध्यान देने की जरूरत है ताकि ग्रामीण से लेकर शहरी तक सभी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो। चिकित्सा पद्धति चाहे कोई भी हो उसे विज्ञान की कसौटी पर कसते जाना होगा।
इस महामारी के काल में महंगी चिकित्सा पद्धति भी चिंता का मुख्य विषय बन कर सामने आई है। कोई भी चिकित्सा पद्धति यदि गरीबों की पहुंच से बाहर हो जाए तो वह अपनी अर्थवत्ता खो देगी।
चिकित्सा-पद्धति की वैज्ञानिकता के साथ चिकित्सा की सर्वसुलभता आज प्रमुख मुद्दा है। इस संबंध में 5000 वर्ष पूर्व चीन में प्रचलित चिकित्सा-पद्धति ध्यान देने योग्य है। उस समय डॉक्टर को वेतन इसी बात का मिलता था कि वह किसी को अपने क्षेत्र में बीमार न होने दे। अगर कोई बीमार हो जाता था तो चिकित्सक को उल्टे रोगी को पैसे चुकाने पड़ते थे।
अतः "श्रेष्ठ- चिकित्सक" वह था जो बीमारी प्रगट होने के पहले ही उसे ठीक कर देता था। "साधारण-चिकित्सक " बीमारी के प्रकट होने के बाद उसे रोकने का प्रयत्न करता था।
महामारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसी क्षेत्र को संक्रमित न होने दिया जाए और संक्रमण हो जाने पर उसका तुरंत इलाज कर काबू कर लिया जाए। टेस्टिंग-ट्रेसिंग-ट्रीटमेंट के मंत्र को व्यवहार में लाने के लिए बहुत बड़े समर्पण की जरूरत होगी। इसमें चिकित्सक को शिक्षक की भूमिका भी निभानी होगी। जन-जागरण और रोग- निवारण की दोहरी चुनौती के समय में जो भी चिकित्सा पद्धति प्रभावी होगी, वह लोगों के दिलों में अपना जगह बना लेगी।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹