संवाद


"अग्नि-परीक्षा"


12th बोर्ड की परीक्षा सरकार और अभिभावकों के साथ विद्यार्थियों के लिए किसी अग्नि-परीक्षा से कम नहीं।


सबसे दयनीय मानसिक स्थिति में विद्यार्थी हैं। दूसरी लहर की संक्रामकता और आक्रामकता ने हर परिवार को तोड़ कर रख दिया है। ऐसे में पढ़ने के लिए जैसा मन और एकाग्रता चाहिए,वह अधिकांश विद्यार्थियों को नसीब नहीं हुई। चारों तरफ घट रही मृत्यु के भय के ‌ साथ परीक्षा के भय ने बच्चों को अवसाद में धकेल दिया है।


अभिभावकों की समस्या कम जटिल नहीं है। परिवार को सुरक्षित रखने के साथ बच्चों को पढ़ने हेतु उचित वातावरण दे पाना उनके लिए संभव नहीं हो पा रहा है।


सरकार के साथ चुनौती यह है कि यदि वह परीक्षा करवाती है तो संक्रमण का खतरा सर पर मंडरा रहा है और यदि परीक्षा नहीं करवाती है तो बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ा जा रहा है। क्योंकि मेरिट के आधार पर ही सब्जेक्ट और संस्थान नियत किए जाते हैं।


ऐसे द्वंद्व की स्थिति में शिक्षाविदों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती हैं। मेरे जेहन में जो सुझाव उभर कर आ रहे हैं,वे सुझाव एक शिक्षक होने के साथ अभिभावक के रूप में भी दिए जा रहे हैं-


(१) यदि परीक्षार्थियों और परीक्षा से जुड़े कर्मचारियों के टीका लगवाने की व्यवस्था की जा सके तो विद्यार्थियों के साथ शिक्षक और अभिभावक भी सुरक्षित रूप में परीक्षा-आयोजन में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।


(२) मेरिटोरियस विद्यार्थियों के साथ अन्याय नहीं हो इसके लिए परीक्षा की गुणवत्ता पर भी ध्यान रखना होगा और अधिकांश विद्यार्थियों के टूटे हुए मन को देखते हुए पेपर moderate भी होना चाहिए।


(३) चिकित्सकों और विशेषज्ञों की राय लेकर सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी ;अन्यथा यूपी के पंचायत चुनाव की तरह यदि शिक्षकों याअन्य कर्मियों की बलि चढ़ने लगे तो चुनाव की तरह परीक्षा भी खौफ का पर्याय हो जाएगा।


(४) तीसरी लहर में सर्वाधिक खतरा बच्चों पर बताया गया है , इसके मद्देनजर परीक्षा केंद्रों पर जुटनेवाली भीड़ की भी पर्याप्त व्यवस्था कर पाना एक चुनौती भरा काम है।


सबके बावजूद सामूहिक जिम्मेदारी की भावना से यदि अच्छा सामंजस्य बिठाया जाए तो न्यूनतम रिस्क में परीक्षा को आयोजित करके विद्यार्थियों के भविष्य को आगे बढ़ाया जा सकता है।


इसमें सबसे बड़ी भूमिका विद्यार्थी और अभिभावक की होगी कि वे गाइडलाइन का पूर्णत: पालन करें और किसी भी सच्चाई को न छुपाएं ‌। सरकारी स्तर पर जो कमियां पाई गईं, उनको दोहराया नहीं जाए। परीक्षा का आयोजन करके जिंदगी को तो आगे बढ़ाना है ही किंतु ज्यादा से ज्यादा सफल तरीके से इसका आयोजन करके जिंदगी को एक विश्वास भी देना है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹