संवाद


"कोरोना का वुहान कनेक्शन?"


जिस वायरस से मानव जाति संकट में है, क्या वह लैब में तैयार किया गया है? इस बात की जांच के आदेश अमेरिकी राष्ट्रपति वाइडेन ने दिए हैं।


यह बात साबित हो या न हो, किंतु एक बात साबित हो चुकी है कि विज्ञान की शक्तियों का दुरुपयोग राजनीति कर रही हैं। वैज्ञानिक खोज की दशा और दिशा राजनीतिज्ञ निर्धारित कर रहे हैं,इसी कारण से इतनी गरीबी के बीच इतने प्रकार के शस्त्रास्त्रों का निर्माण हो रहा है। आणविक हथियार से लेकर जैविक हथियार तक के निर्माण के पीछे वैज्ञानिकों की प्रतिभा ही है, यद्यपि उसे आर्थिक सहायता राजनीतिज्ञ प्रदान कर रहा है। यदि इतनी बड़ी धनराशि का उपयोग शिक्षक व डॉक्टर तैयार करने में किया जाता और शिक्षालय तथा अस्पताल निर्माण में किया जाता तो यह दुनिया कुछ और ही प्रकार की होती।


यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि "क्या वैज्ञानिकों को अपनी प्रतिभा का उपयोग किसी राजनीतिक दबाव में विध्वंसात्मक कार्यों में करना चाहिए?"


आइंस्टीन ने मरने से पूर्व कहा था कि "यदि मैं जानता कि मेरे जीवन भर के काम की निष्पत्ति आणविक-युद्ध के रूप में होगी तो मैं कभी भी भौतिकविद नहीं बनता।" यह महान वैज्ञानिक इस प्रार्थना के साथ मरा कि हे परमात्मा! अगले जन्म में मुझे प्लंबर बनाना, भौतिकविद नहीं।


आज जरूरत है कि हर वैज्ञानिक इस बात पर जरूर गौर करे कि उसकी प्रतिभा का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए हो रहा है और कौन कर रहा है?


यदि मानवता को विनाश से बचाना है तो वैज्ञानिकों को अपनी आत्मा से यह अवश्य पूछना होगा कि उनके ज्ञान का सदुपयोग हो रहा है या दुरुपयोग?


मिसाइल-मैन एपीजेअब्दुल कलाम से एक बार पूछा गया कि आपको सबसे ज्यादा संतुष्टि अपने किस रिसर्च से प्राप्त हुई? तो भारत रत्न ने जवाब दिया कि मनुष्य के कृत्रिम अंग के निर्माण में जब मेरी प्रतिभा का सदुपयोग हुआ।


"मंगल पर पहुंच चुके हैं विज्ञान के पांव


देखना यह है कि इंसान कहां तक पहुंचे?


अमंगल की दास्तान है जहां तक पहुंचे


मेरी आरजू है कि मंगल भी वहां तक पहुंचे।।"


जब विज्ञान सृजन की सेवा में लग सकता है तो विध्वंस की सेवा में क्यों लगे?


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹