संवाद


"क्या बतलाऊं इस जीवन में रुदन अधिक या हास अधिक है?"


पति के परिवार में भगिना की शादी थी और दूसरी तरफ पत्नी के परिवार से उसी दिन भाभी के कोरोना से मरने की खबर आई। काफी दिनों से चल रहे तनाव के बीच शादी का अवसर एक खुश होने का मौका था कि उसी वक्त बच्चों को अनाथ छोड़कर नई उम्र में काल के गाल में समा जाने पर दर्द का मौसम आ गया। मन निर्णय नहीं कर पा रहा था कि शादी के जश्न में शरीक हो या कि मौत के गम में-


"एक तरफ अर्थी उठती है ,एक तरफ श्रृंगार है;


विधना के बस इसी खेल में यह मिट्टी लाचार है।


एक तरफ दर्दीला मातम, एक तरफ त्यौहार है;


विधना के बस इसी खेल में यह मिट्टी लाचार है।।


द्वंद में रात भर नींद नहीं आई और सुबह छत पर टहलते हुए नजर अस्त होते हुए चंद्रमा पर पड़ी और दूसरी तरफ उदित होते हुए सूर्य परआखिर मन क्या करे; उदय का जश्न मनाए या अवसान का गम?


इसी बीच पंछियों का कलरव सुनाई पड़ने लगा। न जाने किस उमंग और उल्लास में वे चहचहाती हुई अन्न-दाने की खोज में समूह में आगे बढ़ रही थीं। लगता था कि विश्व की दो महान विभूतियों के उदय और अवसान से या तो उन्हें कोई लेना देना नहीं था या वे जानबूझकर अनभिज्ञ बनी हुई थीं। अथवा यह भी हो सकता है कि वे सुख दुख से ऊपर उठकर जीवन जीने की कोई कला जानती हों।


आकाश को निहारता हुआ मैं सारे दृश्यों को देख रहा था तभी मोबाइल की घंटी बजी। एक दोस्त का फोन था और पूछ रहा था कि हालचाल कैसा है? मेरे मुख से निकला कि इसी प्रश्न का उत्तर तो मैं भी ढूंढ रहा था।


दोस्त ने कहा- मैं कुछ समझा नहीं। सारी बातों को बताते हुए कहा कि समझ में तो मेरे भी नहीं आ रहा-


"क्या बतलाऊं इन नयनों में नीर अधिक या प्यास अधिक है?


क्या बतलाऊं इस जीवन में रूदन अधिक या हास अधिक है??"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹