पावर सिंड्रोम और सुशील
June 12, 2021संवाद
"पावर सिंड्रोम और सुशील"
' पावर सिंड्रोम' एक मनोविकार है जिसमें दूसरों को अपने पूर्ण नियंत्रण में करने की भावना होती है जबकि 'सुशील' शब्द का अर्थ हृदय का वह उच्च-स्थायी-भाव है जिसमें दूसरे को अपने समान देखने की भावना होती है।
"स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निवास होता है" इस कहावत पर पुनर्विचार के लिए सुशील पहलवान की घटना ने बाध्य कर दिया। दो बार के ओलंपिक मेडलिस्ट और भारतीय कुश्ती के पोस्टर बॉय को धन-पद-प्रतिष्ठा हर चीज नसीब हो गई थी। फिर यह सनक कहां से घिर गई कि आसपास के लोगों पर पूर्ण प्रभुत्व की कामना करने लगे? सुंदर शरीर में सुंदर मन का निर्माण क्यों नहीं हो सका?
स्पोर्ट्समैन-स्पिरिट (खेल-भावना) के कारण उनमें सचिन तेंदुलकर जैसी विनम्रता आनी चाहिए थी जिसने इंसान को भगवान का दर्जा दिला दिया।
किंतु अपने आसपास के लोगों के साथ जो उनके व्यवहार की कहानी आ रही है,वह उन्हें स्पोर्टिंग लीजेंड की जगह क्राइम सिंडिकेट का लीडर साबित कर रही है। संस्कार और शील के अभाव में सुशील अर्श से फर्श पर ही नहीं गिरा बल्कि सलाखों के पीछे चला गया।
"सत्यम् तपो जपो ज्ञानम् सर्वा विद्या: कला अपि,
नरस्य निष्फला: संति यस्य शीलम् न विद्यते।।"-
ऋषि-वाणी है कि शील के अभाव में सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। शील के अभाव में आज सुशील की तपस्या,कला,मल्ल-विद्या इत्यादि सब कुछ व्यर्थ हो गई। यहां तक कि न्यायालय ने उसके स्पेशल डाइट की अर्जी खारिज कर दी। अर्थात् उसे अब अन्य अपराधियों के समान ही जेल में रहना होगा।
राजनेताओं से निराश हुई दुनिया को खेल,कला,शिक्षा,संस्कृति के आइकॉन से बहुत बड़ी प्रेरणा मिलती है। यदि उनमें भी राजनीति के दुर्गुण जगह बनाने लगेंगे तो सद्गुण कहां पर आश्रय लेंगे?
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹