संवाद


"अंधेरे में उम्मीद की किरण"


मौतों के परिवर्तित आंकड़े सुर्खियों में हैं और सरकारें सवालों के घेरे में। सरकारी आंकड़े कुछ और कह रहे हैं जबकि जलती चिताएं, कम पड़ती कब्रगाहें और तैरती लाशें कुछ और।


"ऐ समंदर! तेरी खामोशी कुछ और कहती है,


साहिल पर टूटी कश्तियां कुछ और कहती हैं।"


क्या महामारी का सारा पक्ष अंधकारपूर्ण है? नहीं, जब सामाजिक संगठनों की सक्रियता को देखता हूं और स्वत:प्रेरणा से व्यक्तिगत जिम्मेदारी के एहसासों को देखता हूं तो मुझे प्रकाशपूर्ण पक्ष दिखाई देता है। ऑक्सीजन के इंतजाम में जब सरकारें असहाय दिख रही थीं तब सिखों के श्री गुरु सिंह सभा ने दिल्ली में सभी के लिए ऑक्सीजन लंगर चलाकर और अस्पताल बनवा कर एक अद्भुत प्रेरणादायी कार्य किया है। इस प्रयास की खूबसूरती इस बात में थी कि सभी जाति,धर्म के लिए उनके दरवाजे खुले हुए थे।


_बांसवाड़ा जैसे दूरदराज के क्षेत्र में भी सामाजिक संगठनों की सक्रियता और संवेदनशीलता ने हृदय को स्पर्श किया है।_ जो संगठन कभी संघर्ष के लिए बनाए जाते थे वे आज सहयोग के लिए बनाए जा रहे हैं। उनके द्वारा अनाथ बच्चों को गोद लेने से लेकर मेडिकल उपकरणों के मंगाने तक के कार्य बहुत बड़ी आशा जगाते हैं।


इसी प्रकार से युवाओं की टोलियां व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से संगठित होकर जनसेवा का ऐसा कार्य कर रही है कि जवानी की नयी परिभाषा गढ़ने को जी चाहता है।


महामारी में एक तरफ सरकारों की सीमा सबके सामने उभर कर आई तो दूसरी तरफ समाजों की और संवेदनशील नागरिकों की असीमता का भी पता चला।


इसके बहुत दूरगामी परिणाम होने वाले हैं।


सरकारों से निराश हुए लोगों का भरोसा सामाजिक संगठनों और सोनू सूद जैसे अनेक स्वयंसेवकों ने जीता है। सेवाभावी लोगों के हाथों में नेतृत्व का आना राजनीति को भी एक नई दिशा दे सकता है; क्योंकि-


"इन आंखों ने देखा है शहर का मंजर कुछ और ,


सरकार की सब सुर्खियां कुछ और कहती हैं।।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹