संवाद


"साधारण पृष्ठभूमि की असाधारण प्रतिभा : डॉ.शंकर लाल जी त्रिवेदी"


1 जुलाई 1921 को जन्मे वागड़ धरा के शैक्षिक और सांस्कृतिक प्रतिमान डॉ शंकर लाल जी त्रिवेदी की सौवीं(१००वीं) जन्मदिवस जयंती हम मना रहे हैं। सौभाग्य से यह सुखद संयोग है कि Govind Guru Tribal University, Banswara ( GGTU ) का स्थापना दिवस भी 1 जुलाई को है।


प्रदर्शन से दूर रहने वाले और अंधेरे में काम करने वाले डॉ शंकर लाल त्रिवेदी जी का नाम बहुत दूर तक बहुत प्रसिद्ध नहीं है; किंतु जिन्होंने बहुत नजदीक से इन्हें देखा है,उनके लिए इनके व्यक्तित्व से ज्यादा हृदय को स्पर्श करने वाला दूसरा व्यक्तित्व ढूंढना मुश्किल है।


बांसवाड़ा में 25 वर्षों के शैक्षिक अनुभव पर मैं दृष्टिपात करता हूं तो पाता हूं कि साधारण से दिखने वाले इस शिक्षक ने असाधारण रूप से मुझे प्रभावित किया।


प्रेम और ज्ञान रूपी दो पंखों से शिक्षा के आकाश में उड़ान भरने वाले इस शख्स की एक खासियत मेरे दिल को छू गई-"मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्"अर्थात् मन,वचन,कर्म की एकता वाला उनका व्यक्तित्व।


जिला शिक्षा अधिकारी के रूप में या प्रशिक्षण महाविद्यालय के संस्थापक के रूप में उनके योगदान की बहुत चर्चा चलती हैं किंतु मेरी नजर में उनका सबसे बड़ा योगदान था विद्यार्थियों के लिए सदा सुलभ होना।


हर रविवार को नियमित रूप से चलने वाली शिष्य- गुरु संवाद केंद्र की चर्चा में एक छोटे से निवेदन पर वे आधे घंटे में सुबह 6:30 बजे पहुंच गए और 4 घंटे तक उन्होंने अपने शिक्षा-दर्शन की बातें विद्यार्थियों के साथ साझा की। चुनिंदा 7 विद्यार्थियों की छोटी गोष्ठी में प्रश्नों का जवाब देते हुए ज्ञानमेघ 4 घंटे तक बरसते रहे और सभी को अपने प्रेम से सराबोर कर दिए।


शिक्षा जगत के वर्तमान हालात को देखकर उनकी पीड़ा उस दिन छलक गई और उस पीड़ा को उपस्थित श्रोताओं ने अपने हृदय रूपी पात्र में समेट लिया -


(१) उनकी सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि शिक्षा संस्थान ध्यान केंद्रित होने चाहिए जबकि आज धन-केंद्रित हो गए हैं। 'विद्यार्थियों को असली जीवन कैसे मिले और उनका यह जीवन कैसे खिले' इस महत्वपूर्ण बिंदु पर से ध्यान हट गया है और धन कमाने के चक्कर में हम उस मन की बलि चढ़ाते जा रहे हैं जो सुमन बनकर परिवेश को सुवासित कर सकता था।


(२) उनकी दूसरी सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि शिक्षकों को विद्यार्थियों में प्रश्न पैदा करना चाहिए और प्यास पैदा करनी चाहिए। किंतु आज शिक्षक बने बनाए नोट्स दे देते हैं, जिससे विद्यार्थियों की जिज्ञासा मरती जा रही है।


(३) उनकी तीसरी सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि पुस्तकधारिणी की पूजा करने वाली पीढ़ी पासबुक-धारिणी बन गई। मौलिक पुस्तकें लिखने वाले गरीब होते चले गए और पासबुक छापने वाले अमीर। पुस्तकें चेतना के दीप प्रज्वलित करती हैं। बांसवाड़ा की शिक्षा में जो समझ और सोच का अभाव दिख रहा है, उसके मूल में पासबुक कल्चर और स्वाध्याय की कमी है।


सही मायने में विश्वविद्यालय की स्थापना के आधार-स्तंभ इस महान शिक्षक ने उस दिन गिनाए थे। उन्हीं आधार स्तंभों के निर्माण में अपना जीवन खपाया था। एक जले हुए दीए की भांति वे अपनी रोशनी लुटाकर महाकाश में विलीन हो गए किंतु कई दीए अपने जाने के पहले जला गए।


ज्ञान-कर्म-भक्ति की त्रिवेणी डॉ शंकर लाल जी त्रिवेदी के सान्निध्य पाकर जो दीप प्रज्वलित हुए हैं, उनके ऊपर बहुत बड़ा यह ऋषि-ऋण है कि उनके जीवन मूल्यों को आगे बढ़ाएं। _उनके जीवन को देखकर शिक्षा की मेरी परिभाषा ही बदल गई_और मेरे हृदय के भाव इन शब्दों में उतर आए -


"आधुनिक शिक्षा ने हम पर ऐसी मान्यताएं लादी हैं,


कि हर व्यक्ति खुद से दूर दौड़ रहा पाने को गादी है।


खुद को जो खुद से मिला सके वही शिक्षा है,


अन्यथा एक भिखारी की दूसरे भिखारी को दी गई भिक्षा है।


बने बनाए उत्तरों में हम आज इतने खब से गए हैं


कि मूल प्रश्न जीवन के कहीं दब से गए हैं।


विश्वविद्यालय का गोल्ड मेडलिस्ट सड़क पर खड़ा था,


उपाधियों के ढेर तले उसका अरमान पड़ा था।


परीक्षा जिंदगी की आज वह फेल हो गया था,


अनमोल सा हीरा बेमोल सेल हो गया था।।


यदि डॉ शंकर लाल त्रिवेदी जी सर के पदचिन्हों पर चल पाएंगे तो अनमोल हीरे जिंदगी की परीक्षा में भी असली हीरे (डायमंड) साबित हो पाएंगे।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹