विद्या तेजस्वी कैसे हो?
July 5, 2021संवाद
"विद्या तेजस्वी कैसे हो?"
स्थापना दिवस की सार्थकता Motto (ध्येय-वाक्य)की भावना व्यावहारिक धरातल पर स्थापित करने में है। *Govind Guru Tribal University, Banswara (GGTU)का ध्येय-वाक्य है-"तेजस्विनावधीतमस्तु"अर्थात् "हम दोनों की विद्या तेजस्वी हो"।
स्थापना दिवस कार्यक्रमों की शुभवेला में विश्वविद्यालय से जुड़े सभी लोगों के जेहन में उसका ध्येय-वाक्य स्पष्ट होना चाहिए।
बीज में जिस प्रकार से वृक्ष छुपा होता है, उसी प्रकार से ध्येय-वाक्य में मार्ग और मंजिल भी छुपा होता है। इसी कसौटी पर हमें परखना होगा कि इतने वर्षों में हम कितना सफल हुए हैं।
गुरु और शिष्य दोनों प्रार्थना करते हैं कि हे परमात्मा! हम दोनों की विद्या तेजस्वी हो।
(१)उपनिषद काल से चली आ रही यह भावना है। गुरु भी अपने ज्ञान को बढ़ाते रहने के लिए शिष्य के साथ प्रार्थनारत होता था। यह विनम्रता और प्यास को दर्शाता है।
जानने वाले के लिए कुछ चीजें ज्ञात हो जाती हैं लेकिन जानने के प्रयास में बहुत अज्ञात क्षेत्रों का भी पता चलता है क्योंकि ज्ञान अनंत है। पंडित नेहरू कहा करते थे- "The more I knew the more I came to know, how little I know and how much more there is to know"
(२)इस प्रार्थना में यह भी भाव है कि _गुरु और शिष्य का सान्निध्य सबसे महत्वपूर्ण है। जले हुए दिए के पास बुझा हुआ दीया साधनारत व प्रतीक्षारत होता था।_ ज्ञान की हवाएं अनुकूल समय पाकर बुझे हुए दीए की ज्योति जला देती थी।
उपनिषद का अर्थ होता है गुरु के पास निष्ठापूर्वक बैठना।
(३)गुरु व शिष्य के गहरे आत्मिक संबंध और व्यावहारिक ज्ञान से जीवन बदलता है। गुरु जिन शब्दों को अपना जीवन नहीं बना पाता था,उन शब्दों को शिष्य के सामने नहीं बोलता था। कभी-कभी तो गुरु जीवन की सबसे गहरी बातें बिना शब्दों के ही जीकर बता देता था-
"उनसे जब दिल की मुलाकात होती है,
बज्म में कायनात होती है।
लब को महसूस तक नहीं होता,
आंखों ही आंखों में बात होती हैं।।"
World University ranking में QS रेटिंग के अनुसार आज जब विश्व के टॉप 100 संस्थानों में एक भी भारतीय शिक्षा संस्थान नहीं है तो हमें यह विचार करना होगा कि क्यों हमारे विश्वविद्यालय पिछड़े हैं? और पिछड़े क्षेत्र में खोले गए जीजीटीयू विश्वविद्यालय के सामने चुनौतियां क्या है?
अब हम इस ध्येयवाक्य के आलोक में अपनी वस्तुस्थिति पर गौर करें-
(१)क्या हमारे विश्वविद्यालय में गुरु शिष्य का अनुपात ऐसा है कि गुरु प्रत्येक शिष्य पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दे सके?
(२) क्या हमारे पास इतने संसाधन हैं कि गुरु व शिष्य एकांत में बैठकर जीवन बदलने की साधना कर सकें?
(३) क्या शिक्षण और शोध की गुणवत्ता ऐसी है कि विश्व मानक पर हम खरा उतर सकें?
कोरोना काल में ऑनलाइन एजुकेशन सूचना और शिक्षा प्रदान करने का सशक्त माध्यम बनकर उभरा है किंतु जीजीटीयू के ऑनलाइन कार्यक्रमों से जुड़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या उत्साहजनक नहीं है। जीवन परिवर्तन करने के लिए साधनविहीन एकलव्यों हेतु बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।
ध्येयवाक्य के शब्द और उसके निहितार्थ को अपने हृदय में सदैव बिठाए रखने की जरूरत है ताकि सतत प्रेरणा प्राप्त कर मंजिल की ओर अग्रसर होते रहें।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹