संवाद


"मौसम है कातिलाना"


जेठ में जलते सूरज के कारण जिस आकाश की ओर लोग आंखें नहीं उठा पाते हैं, आषाढ़ में काले बादल को उमड़ते- घुमड़ते देखकर उसी आकाश की ओर से आंखें नहीं हटा पाते हैं। मानसून के आते ही मौसम आशिकाना हो जाता है। गर्मी के कारण फटी दरारों के रूप में धरती वर्षा की बूंद के लिए आकाश की ओर अपना मुंह खोल देती हैं। घरों में सिमटे दुबके लोग हरी-भरी वादियों में सैर के लिए निकल जाते हैं। उनका मन मयूर नाच उठता है और गाने लगता है-


वसनों की चिंता छोड़ो सुख है अब ऐसी नादानी में


हम दोनों साथ खड़े भींगे बरखा के पहले पानी में।


किंतु ऐसा क्या हुआ कि अब बादल बरसते नहीं फटते हैं, बिजली चमकती नहीं गिरती है। बरखा अब धरती की प्यास नहीं बुझाती बल्कि बस्तियों को बहा ले जाती है।


आकाशीय बिजली गिरने से कई घरों के चिराग बुझ गए। खुशी मातम में बदल गई। अब तो बारिश में निकलने से डर लगने लगा।


अब हर मौसम तीखा क्यों हो गया? प्रकृति का सौम्य रूप रौद्र रूप में क्यों बदल गया? अब तो न ठंड बर्दाश्त होती है और न गर्मी। अब तो बसंत और सावन भी सुकून देने से कतराने लगा।


जरूर कुछ गलती हुई है जिसकी सजा हम सभी को मिल रही है। नदियों के रास्ते मोड़ देना ,पहाड़ों को काटकर रास्ता बना देना, हरे-भरे जंगलों को नष्ट कर कंक्रीट के आशियाने खड़े कर देना,अंतरिक्ष में अपने झंडे गाड़ देना तथा नाभिकीय और जैविकीय युद्ध की तैयारी कर लेना इत्यादि को उपलब्धियों में गिनाया जाता है किंतु घट रही दुर्घटनाएं इन सभी को व्याधियां साबित कर रही हैं।


शिष्य गुरु संवाद से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹