परीक्षा और परिणाम
July 16, 2021संवाद
"परीक्षा और परिणाम"
किसी भी परीक्षा का परिणाम आते ही आम जनजीवन में एक हलचल सी मच जाती है। जब परीक्षा परिणाम नौकरी से जुड़ा हो तो वातावरण आंदोलित सा हो जाता है। अंडरग्राउंड होकर जो साधनारत थे, वे हीरे (डायमंड्स)अचानक सबके सामने आ जाते हैं।
आर ए एस परीक्षा परिणाम से सामने आया कि कोई "मुक्ता राव" शादी होने के 14 साल बाद और बच्चे के सार संभाल के साथ घर की सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए तथा परीक्षा के दौरान मां के निधन होने के आघात को सहकर भी टूटती नहीं है और प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में टॉप कर जाती हैं। कोई दृष्टिहीन अपनी विकलांगता को दुर्बलता की जगह शक्ति बनाने की दृष्टि लेकर आगे बढ़ता है और अंततः सफलता पा लेता है। सड़क पर बुहारी लगाने वाली भी अवसर मिलते ही शीर्ष पदों पर पहुंच सकती हैं।
एक व्यक्ति की सफलता परिवार को ही नहीं, परिवेश को भी आशा और उत्साह से भर देती हैं। समाज में उसके सद्गुणों की चर्चा होने लगती है और निराशा से घिरती हुई कई आत्माओं को सूरज की किरण की झलक मिल जाती है। मेहनत और व्यवस्था के प्रति एक भरोसा जगता है जो जीवन को सकारात्मकता से भर देता है।
बी ए और एम ए के बाद नौकरी की तलाश में भटक रहे करोड़ों बेरोजगार परीक्षा का फॉर्म भरते ही तपस्या में लीन हो जाते हैं जिसके कारण उन्हें भटकने का मौका नहीं मिलता और अपने अभावों का पता नहीं चलता क्योंकि आंखों में सिर्फ मंजिल होती है। फिर मार्ग में बिखरे हुए कांटों की गिनती वे नहीं करते बल्कि मंजिल पर मिलने वाले फूल को हृदय में बसाए आगे बढ़ते हैं।
नौकरी नहीं होने के कारण आज के युवा शादी ही नहीं करते, इससे समाज का ताना-बाना प्रभावित होता है। एक गाना ऐसे बेरोजगारों के समूह में बहुत लोकप्रिय हुआ था-
"मैं कहां से लाऊंगा रेशम की साड़ी,ये गाड़ी ये बंगला नहीं दे सकूंगा;
मेरा दिल ही एक मेरी मिल्कियत है,जो चाहो तो इसको यही दे सकूंगा।"
किंतु गृहस्थी की गाड़ी सिर्फ दिल से नहीं चलती, उसके लिए अर्थ के पहिए चाहिए।
अतः सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह उपस्थित हुई है कि विश्व की सबसे बड़ी युवा पीढ़ी को रोजगार कैसे उपलब्ध कराया जाए और इन्हें सृजनात्मक कार्यों में कैसे लगाया जाए? इसके लिए प्रतियोगी परीक्षाओं का नियमित और पारदर्शी आयोजन समयबद्ध ढंग से किया जाना चाहिए-
"एक नया सूरज उगाओ आज अपने देश में,
मेहनतों को दो सवेरा और थकन को शाम दो।
कामयाबी के लिए अगर हो सके इंसान की,
आरजू को हौंसला दो, हौंसलों को काम दो।।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹