संवाद


"गुरुता से प्रभुता मिले"


गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर श्री गोविंद गुरु कॉलेज_ का ध्येयवाक्य हृदयंगम करने योग्य है- "धियो यो न:प्रचोदयात्"


गायत्री मंत्र के इस वाक्यांश में प्रार्थना किया गया है कि परमात्मा "हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे।"


बुद्धिप्रधान इस युग में हमें चारों तरफ बुद्धि का दुरुपयोग अधिक और सदुपयोग बहुत कम दिखाई दे रहा है।_ इसी कारण से जो बुद्धि संवाद की ओर ले जा सकती थी,वह विवाद की ओर ले जा रही है। दूसरे को नीचे गिराने के लिए रचे षड्यंत्र में बुद्धि का उपयोग करने से क्षुद्र की ओर कदम बढ़ जाते हैं; फिर कलह और अशांति का वातावरण निर्मित हो जाता है‌।


गुरुत्व के अभाव में गोविंदत्व संभव नहीं। गुरुता के बिना अक्ल जितनी बढ़ती है, आत्मा उतनी ही अंधकारपूर्ण होती चली जाती है-


अक्ल बारीक हुई जाती है,


रूह तारीक हुई जाती है।


किंतु जब यह बुद्धि गुरु के सान्निध्य के कारण परमात्मा के प्रकाश से प्रकाशित होती है तो क्षुद्र से विराट की ओर कदम बढ़ते हैं, आत्मा से परमात्मा की ओर गति होती है।


अधिकतर लोग बुद्धि का उपयोग बाहर के धन,पद,प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिए ही करते हैं। विरले लोग ही बुद्धि का उपयोग स्वयं के भीतर के परमधन,परमपद और परमप्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिए करते हैं। गुरु के बिना बुद्धि अंतरगामी और ऊर्ध्वगामी नहीं हो सकती।


यही कारण है कि वातावरण शैक्षिक कम और राजनीतिक ज्यादा होता जा रहा है तथा चारों तरफ अशांति,वैमनस्य का वातावरण बढ़ता जा रहा है।


_बुद्धि को क्षुद्रता से गुरुता की ओर ले जाने की साधना के लिए शिक्षालय होते हैं।_फिर गुरुता से प्रभुता की प्राप्ति होती है।


किंतु इसके लिए स्वयं गुरु को गुरुता से पूर्ण अर्थात् आत्मवान बनना होगा; क्योंकि आत्मवान ही परमात्मा से मिला सकता है।


महामारी के बाद की दुनिया में महाजीवन की शुरुआत तभी हो सकती है जब हमारी बुद्धि अंतरगामी और ऊर्ध्वगामी हो-


"मैं तमोमय,ज्योति की पर प्यास मुझको


है प्रणय की शक्ति पर विश्वास मुझको।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


गुरु पूर्णिमा की शुभकामना🙏🌹