मीरा सी लगन
July 25, 2021संवाद
"मीरा सी लगन"
मीरा सी लगन हो तो न गरीबी आड़े आती है और न असफलता तोड़ पाती है; न लड़की होने की भावना वेटलिफ्टिंग से रोकती है और न कोरोना महामारी टोक्यो पहुंचने से। _चानू के संकल्प और समर्पण ने मीराबाई की दीवानगी की याद दिला दी।_
दूरदराज के अभावग्रस्त क्षेत्र में भी कैसी-कैसी प्रतिभाएं छुपी हुई हैं, यह दुनिया को तब पता चलता है जब वेटलिफ्टिंग के 125 साल के ओलंपिक इतिहास में भारत को सिल्वर मेडल दिलाने का गौरवपूर्ण क्षण बचपन से लकड़ियों का गट्ठर उठाने वाली बालिका मीरा के माध्यम से आता है, जो 202 किलो का वजन उठा लेती है।
निश्चितरूपेण इस सफलता का श्रेय सरकारों को कम ,उन परिवारों को ज्यादा जाता है,जिन्होंने अपनी बेटियों में अपना प्यार और विश्वास जताया। सबसे ज्यादा श्रेय तो उस मां को जाता है जिसने छ: भाई-बहनों में सबसे छोटी चानू को बेटी होने के बावजूद वेटलिफ्टिंग के जुनून से न टोका और न रोका ; बल्कि उसके सपने को सच करने के लिए सदैव लगी रही। इतना ही नहीं , बेटी के भाग्य को अनुकूल बनाने के लिए ओलंपिक के छल्लो के आकार की इयररिंग्स अपने जेवर को बेचकर बनवा दी।
2016 में रियो ओलंपिक की असफलता ने चानू को तोड़ दिया था और वो आंसूओं के साथ लौटी थी-
"जब निगाहों में सिमट जाते अंधेरे,
जिंदगी बिखरे समय के खा थपेड़े
कौन धुंधलाई हुई परछाइयों में,
जिंदगी के कण तमाम समेट लेता।
जो जमाने से विभाजित हो न पाई,
रह गई अवशेष वह जीवन इकाई
कौन फिर संयोग बन तन्हाइयों में,
जिंदगी को नित नए आयाम देता।।"
मां और परिजनों का प्यार व विश्वास इस अंधेरे में भी मीरा की हौंसला अफजाई करता रहा। आखिरकार वह क्षण आ गया जब चानू के गले में चांदी का ओलंपिक मेडल और आंखों में स्वर्णिम आंसू थे। मां और परिजनों की आंखों में भी आंसू थे क्योंकि उनकी बेटी ने एक ऐसा मुकाम हासिल किया था,जिस पर पूरा देश गर्व कर रहा था।
मैं भी अपनी भावनाओं को व्यक्त करने से नहीं रोक सका क्योंकि इस मेडल जीतने वाली मीरा के साथ मुझे उन मीराओं की भी याद आ गई जो अंधेरे में ही उपेक्षा का शिकार होकर दम तोड़ देती हैं। क्योंकि न तो उन्हें "तोम्बी लिमा" सी मां मिलती है जो अपनी बेटी के जुनून को हौसला दे और न ऐसे परिजन मिलते हैं जो बेटे-बेटियों में फर्क न कर बेटी के हौंसले को आसमान दें।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
CONGRATULATIONS 🙏🌹