सोने की चिड़िया की गोल्ड- साधना
August 6, 2021संवाद
"सोने की चिड़िया की गोल्ड- साधना"
भारत कभी सोने की चिड़िया था क्योंकि विभिन्न कलाओं में विश्व में सिरमौर था और संपन्न भी ; किंतु सोने का एक भी पदक नसीब नहीं हुआ। आखिर क्यूं?
'जो देश गोल्ड मेडल की झड़ी लगा रहे हैं, उनमें और भारत में कहां अंतर है?'-इस पर विचार करने का यह उपयुक्त समय है क्योंकि हमारे गोल्डन खिलाड़ी जितना दिल जीत लेते हैं ,उतना पदक नहीं। खासकर बेटियों ने अभाव की कोख से निकलकर जो प्रभाव छोड़ा है,वह अद्भुत है।
सिर्फ अपनी प्रतिभा और परिश्रम की बदौलत ओलंपिक में पहुंच जाना बहुत बड़ी बात है और स्वर्ण पदक की आस जगा देना तो आश्चर्य। किंतु यह मुमकिन हुआ।
हम सभी भारतीयों ने स्वर्ण पदक पाने की आशा में प्रार्थनाएं की।
किंतु प्रार्थना कुबूल नहीं हुई क्योंकि जिन देशों के पास प्रतिभा और परिश्रम के साथ विशेष प्रशिक्षण की सुविधा थी, वे बाजी मार ले गए।
पदक जीतने पर हमें खिलाड़ियों का नाम पता चलता है। यह भी पता चलता है कि वे कैसे-कैसे अभावों से जूझ रहे हैं। खासकर महिला खिलाड़ियों की दास्तान तो दिल को छू लेने वाली है। किसी के पास समुचित डायट का अभाव है तो किसी के घर में बिजली तक नहीं है; किसी के पास खेलों का सामान नसीब नहीं हो रहा है तो किसी के पास मां-बाप के अलावा समाज का प्रोत्साहन तक नहीं है।
खिलाड़ियों को जो सुविधाएं सरकार को शुरू से देनी चाहिए और जो सोच समाज को खासकर अपनी बेटियों के प्रति अपनानी चाहिए, उसकी कमी के कारण हमारे खिलाड़ी उस स्थान को प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं जिसके वे वास्तविक हकदार हैं।
जिस देश में खेलों का ढांचागत आधार बहुत कमजोर हो तथा "खेलोगे कूदोगे होओगे खराब, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब"की मानसिकता हो, उस देश का विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा में पदक जीतना क्या आश्चर्य से कम नहीं है?
अचानक सरकारें शुभकामना देने लगती हैं और जनता पूजा-हवन करने लगती हैं कि आज भारत गोल्ड लाएगा। इससे खिलाड़ियों पर अतिरिक्त असहनीय दबाव बनता है।
गोल्ड उन्हीं के नसीब में आ रहा जिन्होंने खेलों का ढांचागत आधार बहुत मजबूत करके अपनी प्रतिभाओं को खोजा है और उन्हें विश्वस्तरीय प्रशिक्षण देकर खिलाड़ियों को कंचन सा निखारा है।
पदक जीतने के बाद जितना पद और पैसों की बारिश होने लगती है, उतना ही प्रतिभाओं को खोजने और उन्हें समुचित सुविधा और प्रशिक्षण देने पर खर्च किया जाता तो सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत आज गोल्ड से वंचित नहीं रहता । इस दिशा में उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक जी ने जो पहल की है,उसका अनुकरण व अनुसरण सभी को करना चाहिए-
"यूं ही नहीं मिलती राही को मंजिल, एक जुनून सा दिल में जगाना पड़ता है।
पूछा चिड़िया से कैसे बना आशियाना? तो वह बोली-भरनी पड़ती है उड़ान बार-बार,तिनका तिनका उठाना पड़ता है।।"
भारतीय खिलाड़ियों खासकर बेटियों की प्रतिभा और परिश्रम तो विश्व के सामने सोने सा चमक गया; किंतु हर जुनून को शुरुआत से ही समाज और सरकार द्वारा समुचित प्रोत्साहन और विश्वस्तरीय प्रशिक्षण मिले तो भारत का एक नहीं,अनेकों गोल्ड मेडल पाने का सपना साकार हो सकता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹