संवाद


"गोल्डन थ्रो के मायने"


पदक चूकने के कारण बेटियों की आंसुओं से भींगा देश काले मेघ से घिरे आकाश की ओर देख ही रहा था कि अचानक आशा का सूरज चमक उठा-


"खोल आंख जमीं देख,फलक देख,फजा देख ;


मशरिक से उभरते हुए सूरज को जरा देख।।"


आज उस सूरज का नाम "नीरज" है जिसने 130 करोड़ भारतीयों को यह भरोसा दिलाया कि यह धरती वीरान नहीं हुई है; बस जरा सा अनुकूल मौसम चाहिए।


प्राचीन काल में भाला,गदा,धनुष-तीर इत्यादि शस्त्रास्त्रों से युद्ध लड़े जाते थे। जेवलिन थ्रो अर्थात् भाला फेंक प्रतियोगिता में भारत की स्वर्णिम जीत इस मायने में विशेष है कि ग्रामीण तथा पिछड़े क्षेत्र के खिलाड़ी भी इस सपने को देख सकते हैं और साकार कर सकते हैं।


भारत के साथ कुछ दुर्भाग्य घटित हुए हैं,उनमें से सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि भाषा के नाम पर अंग्रेजी और खेल के नाम पर क्रिकेट का इतना विज्ञापन किया गया है कि अन्य भाषाओं और अन्य खेलों की प्रतिभाएं बीज रूप में ही रह जाती हैं; उन्हें न तो कोई उपजाऊ भूमि मिलती हैं और न खाद-पानी।


भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जब तक विविध भाषाओं और विविध खेलों को प्रोत्साहन नहीं दिया जाता तब तक अंगुलियों पर गिने जाने योग्य लोग ही भारत की आन-बान-शान के ध्वजवाहक होंगे। बाकी करोड़ों लोग स्तुति-गान या ताली बजाने में ही रह जाएंगे।


मेरी दृष्टि में टोक्यो ओलंपिक की विविध प्रतिस्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ियों की जीत और शानदार प्रदर्शन के मायने यह है कि यहां किसी भी खेल में प्रतिभा की कमी नहीं है किंतु स्थानीय तथा राष्ट्रीय स्तर की प्लानिंग की बहुत बड़ी कमी है। एक तरफ पड़ोसी देश चीन परंपरा अनुकूल विविध प्रकार के खेलों की प्रतिभाओं को तैयार करने की योजना बना कर पदक तालिका में शीर्ष पर है; दूसरी तरफ भारत अपनी बहुमुखी प्रतिभाओं के बावजूद ऐसी योजना के अभाव में बहुत पीछे हैं-


"अयोग्य:पुरुष:नास्ति; योजक: तत्र दुर्लभम्"


योजनाकार या प्लानर के अभाव में भी अपनी प्रतिभा और परिश्रम की बदौलत नीरज चोपड़ा द्वारा गोल्ड जीतने की खुशी इतनी बड़ी है कि कोई गाकर तो कोई नाच कर इसे अभिव्यक्त कर रहा है; मैं भी कुछ लिखकर ... मेरे देश की धरती सोना उगले , उगले हीरे मोती..


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


Congratulations INDIA 🙏🌹