प्रकृति के साथ जीने की कला
August 8, 2021संवाद
"प्रकृति के साथ जीने की कला"
विश्व आदिवासी दिवस शीघ्र ही सबसे प्रसिद्ध दिवसों में से प्रमुखतम बन जाएगा। क्योंकि महामारी और जलवायु परिवर्तन से त्रस्त दुनिया को निजात दिलाने का महामंत्र आदिवासियों की जीवन शैली में है।
विश्व के विकसित देशों की जीवन शैली "प्रकृति को जीतने की कला" में महारत हासिल कर चुकी है। नदियों के रास्ते रोककर बांध बना देना, पहाड़ को काटकर रास्ता बना देना, हरे-भरे जंगलों को नष्ट कर पत्थरों के गगनचुंबी महलोंवाली बस्ती बसा देना तथा धरती और आकाश में सुरंग बना देना आधुनिक विकास की पहचान है।
दूसरी तरफ प्रकृति को बिना कोई नुकसान पहुंचाए पूजा भाव से प्रकृति से मांग कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेने की कला आदिवासियों की पहचान है। वृक्ष,नदी,धरती,आकाश,चांद व सूरज की पूजा करने वाली यह कॉम विश्व के जिस किसी भी भाग में है, वहां प्रकृति अपने पूरे शबाब पर है। प्रकृति को तहस-नहस करके पैसा बनाने की सीख आदिवासियों ने नहीं पाई है। उन्होंने तो प्रकृति को ही अपना गुरु बना कर पेड़-पौधों,नदी-तालाबों, मैदान-पहाड़ों को उसके शुद्ध स्वरूप में संरक्षित करना सीखा है।
प्रकृति को जीतने वाली आधुनिक विकास की शैली ने जहां कहीं भी अपने कदम रखे हैं,वहां आज विनाश लीला चल रही है। भूस्खलन, जलप्लावन, अतिग्रीष्म,अतिशीत व अतिवृष्टि की घटनाएं प्रतिदिन सुर्खियों में आने लगी हैं जिससे होने वाली जनधन की हानि का आकलन करना मुश्किल हो रहा है।
दूसरी तरफ प्रकृति के साथ जीने वाली आदिवासियों की जीवन शैली का दर्शन जिस क्षेत्र में होता है,वहां प्रकृति के अनुपम सौंदर्य को देखकर लगता है कि इस धरती पर यदि कहीं स्वर्ग है तो यही है,यही है,यही है। रेगिस्तान समझे जाने वाले राजस्थान के सबसे पिछड़े आदिवासी बहुल जिले बांसवाड़ा पहुंच कर विश्व भ्रमण कर चुके ब्लॉगरों ने जब यहां का प्राकृतिक सौंदर्य देखा तो वे मंत्रमुग्ध हो गए और बांसवाड़ा की तुलना स्कॉटलैंड से कर गए।
आदिवासी दिवस विश्व के सामने एक चुनाव रख रहा है- प्रकृति के साथ जीने की कला सीख कर शस्य-श्यामला धरती को बचाना है या प्रकृति को जीतने की कला सीख कर अपने विनाश को निमंत्रित करना है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे
"विश्व आदिवासी दिवस की शुभकामना" 🙏🌹