हिंद और स्वराज के सही मायने
August 14, 2021संवाद
"हिंद और स्वराज के सही मायने"
"हिंद स्वराज अपनाओ, सामाजिक सरोकार बढ़ाओ" विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में अपने को तैयार करने के क्रम में काफी कुछ सीखने को मिला। "हिंद स्वराज" द्वेष की जगह प्रेम को सिखाती है और जख्म को नज्म बनाने की कला बताती है। महात्मा गांधी जीवन दर्शन समिति ने पुस्तक परिचय और समीक्षा की जो शैली अपनाई है, उसके दूरगामी प्रभाव होंगे। क्योंकि
(१) परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े हुए एक दीन-हीन समाज को अपने गंभीर लेखों से महापुरुषों ने झकझोरा था और उसके आत्मबल को जगाया था। व्हाट्सएप में s.m.s. मैसेज को पढ़ने वाली पीढ़ी को गंभीर लेखों वाली पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों की ओर मोड़ना आज जरूरी हो गया है क्योंकि क्षुद्र विचारों से उनमें विभाजनकारी और विनाशकारी प्रवृत्तियों को पनपाया जा रहा है।
(२) संवाद शैली में लिखे गए "हिंद स्वराज" पुस्तक में गांधी ने "पाठक" के रूप में स्वयं ही प्रश्न उठाया है और "संपादक" के रूप में स्वयं ही उसका उत्तर भी दिया है।
आज हर चिंतनशील व्यक्ति के हृदय में प्रश्न उठ रहा है कि यह देश और समाज कहां जा रहा है? बेरोजगारी और महामारी से लड़ने की जगह हम आपस में क्यों लड़ रहे हैं? इनका उत्तर भी उसे स्वयं ही अपने भीतर से ढूंढना होगा,ऐसा गांधी ने सिखाया।
(३) लंदन में अतिवादी समूहों से मिलने के बाद गांधी ने "हिंद स्वराज" पुस्तक लिखी क्योंकि हिंसा के रास्ते से भारत को स्वतंत्र कराने का उग्रवादियों का विचार गांधी को रास नहीं आया और उन्होंने अहिंसा के रास्ते से भारत को स्वतंत्र कराने का विचार आगे बढ़ाया जो "सत्याग्रह" के रूप में उनके द्वारा प्रयोग में लाया गया।
(४) गांधी की दृष्टि में "हिंद" वह देश है जहां पर भारतीय संस्कृति के सनातन मूल्य सत्य,प्रेम,अहिंसा के रास्ते पर चलने वाले लोग रहते हैं चाहे वे किसी भी पंथ को मानते हों । महात्मा की नजरों में "स्वराज" की प्राप्ति सिर्फ अंग्रेजों या अन्य किसी को भगा देने से नहीं होगी बल्कि स्वाध्याय करके अपने मन की कलुषित वृत्तियों को उदात्त वृतियों में परिवर्तित करने से होगी।
सरल शब्दों में जीवन की कठिन समस्याओं का जो सहज समाधान "हिंद स्वराज" में दिया गया है, उसके कारण गांधी भारत ही नहीं विश्व पर भी छा गए और भारत को स्वतंत्र करा गए।
स्वतंत्रता के 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर फिर से गांधी की दृष्टि से "हिंद" और "स्वराज" शब्द का सही अर्थ समझना होगा तभी हम अपनी स्वतंत्रता को बचा पाएंगे-
"परिंदे को पिंजरे से निकालना जरूरी था,
आज जरूरत है परिंदे में से पिंजरे को निकाला जाए।
पुराने जख्म को कुरेदना क्या जरूरी था?
जख्म को नज्म बनाने की कला परिंदे को सिखाया जाए।।
अतः हिंद स्वराज को अपनाया जाए,
और सामाजिक सरोकार को बढ़ाया जाए।।"
'शिष्य गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामना 🙏🌹