संवाद


"एक पाती अपने पीएम के नाम"


परमादरणीय प्रधानमंत्री जी!


'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' पर जब मैंने बंटवारे के दर्द को टीवी पर देखा तो उस प्रोग्राम को बीच में ही बंद करना पड़ा। रात भर नींद नहीं आई और जब झपकी लगी तो डरावने सपने ने उसे भी पूरा नहीं होने दिया। मन नफरत और निराशा के गर्त में गिर गया। यह सोचकर रूह कांप जाती है कि जिन परिवारों ने विभाजन विभीषिका के दंश को साक्षात् झेला होगा, उन दुखद पलों को याद करके कैसी मानसिक स्थिति उनकी बनती होगी?


सुबह स्वतंत्रता दिवस पर जब भारत के महापुरुषों की त्याग-तपस्यापूर्ण गौरव गाथा को समाचारपत्रों में पढ़ा और भारत की वर्तमान प्रतिभाओं के प्रेरणास्पद योगदान को टीवी पर आपको गिनाते देखा तो भविष्य की सुनहरी तस्वीर आंखों में उभरने लगी। मन उमंग और उत्साह से भर गया।


स्वतंत्रता दिवस की खुमारी उतरते ही फिर से मन उधेड़बुन में पड़ गया है-


कब तक दर्द संभाला जाए?


द्वंद्व कहां तक पाला जाए??


उहापोह के बीच मेरा ध्यान महात्मा बुद्ध की "सम्यक्- स्मृति" पर गया। 'सब्बं दुखम्' कहने वाले बुद्ध ने दुख से मुक्ति के लिए अष्टांगिक मार्ग बताए;जिसमें सम्यक्- स्मृति को समझाते हुए उन्होंने कहा कि-


जिन बातों के स्मरण से तुम्हारे मन का अधोगमन होता हो वे 'असम्यक्- स्मृति' हैं।


जिन बातों का स्मरण करने से मन शांत होता है और प्रेम करुणा की ओर उन्मुख होने लगता है, वे बातें सम्यक्-स्मृति के अंतर्गत आती हैं।


महात्मा बुद्ध के बाद इस देश ने गांधी को महात्मा की उपाधि दी। जीवन के अंतिम समय तक वे नफरत के बीच प्रेम की अलख जगाते रहे, हिंसा के रास्ते को खारिज करके अहिंसा का मार्ग सजाते रहे। "सत्य के साथ प्रयोग" करते हुए वे प्रेम और अहिंसा के बल पर साधारण मानव से महामानव बन गए। सम्यक-स्मृति और सम्यक-दृष्टि के कारण उनका जीवन दर्शन था-


"जैसे भी हो हालात उनसे दिल लगाना चाहिए,


जिंदगी से प्यार का कुछ पल चुराना चाहिए।


नफरतों की नागफनियां फैल रही हैं हर तरफ,


कीमती है पैराहन दामन बचाना चाहिए।।"


मनोविज्ञान भी इस बात की गवाही देता है कि स्वस्थ रहने के लिए अतीत की बुरी स्मृतियों को भुलाकर अच्छी स्मृतियों से प्रेरणा ग्रहण कर वर्तमान को ऊंचाइयों की ओर ले जाना चाहिए।


विभाजन का दंश झेल चुके लोग भी हैवानियत की हदें पार कर देने वाली उस विभीषिका को याद करना नहीं चाहते तो फिर "क्यों आपने ऐसा निर्णय लिया?"-यह बात पूरे आदर और सम्मान के साथ आपसे पूछने का मेरा मन कर रहा है।


आपकी भाषण कला और विचार कला का मैं मुरीद हूं, अतः आशा करता हूं कि इस निर्णय के पीछे छिपी हुई अंतर्दृष्टि को आप जरूर बताएंगे।


कहीं आपके हृदय में "विभाजन विभीषिका विस्मृति दिवस" तो नहीं था?


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹