संवाद


"रक्षाबंधन का दर्शन"


रक्षाबंधन रिश्ते को एक नए ढंग से देखने की दृष्टि देता है। हम जिस किसी की भी रक्षा हेतु उसके बंधन को स्वीकार करते हैं, त्यों ही वह बंधन मुक्ति और शक्ति के एक नए आयाम से परिचय करवा देता है। भले ही भाई-बहन के खास रिश्ते के संबंध में ही आज यह पर्व लोकप्रिय हो गया है किंतु प्राचीन काल से ही अन्य कई रिश्तो में भी इस पर्व की महत्ता चली आ रही है। इंद्राणी द्वारा अपने पति इंद्र को राखी बांधना हो अथवा लक्ष्मी द्वारा राजा बलि को अथवा रानी कर्णावती द्वारा हुमायूं को‌।


इसके पीछे मूल भाव यह है कि जिस किसी की भी हम रक्षा का संकल्प करते हैं, वह हमें रक्षा करने की शक्ति भी प्रदान करने लगता है।


"धर्मो रक्षति रक्षित:" सूत्र कहता है कि रक्षा किया हुआ धर्म हमारी रक्षा करता है। यहां धर्म व्यापक अर्थों में लिया गया है। भाई के रूप में बहन की रक्षा करने का धर्म हो या नागरिक के रूप में राष्ट्र की रक्षा करने का या वृक्ष-मित्र के रुप में प्रकृति की रक्षा करने का।


सभी के प्रति हम अपने कर्तव्य रूपी धर्म की रक्षा का जितना बड़ा संकल्प लेंगे, उतनी ही बड़ी शक्ति अस्तित्व देना शुरू कर देता है।


अधिकार प्रमुख चेतना को कर्तव्य-प्रमुख बनाने में रक्षाबंधन की बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है। जिस बंधन को नकारात्मक रूप में लिया जाता है रक्षाबंधन में वही सकारात्मक रूप धारण कर लेता है। जिस भाई को बहन नहीं हो या जिस बहन को भाई नहीं हो, वे इस दिन को कुछ कमी सा महसूस करते हैं।


भौंरा लकड़ी के बक्से को काटकर बाहर निकलने की सामर्थ्य रखता है किंतु फूल की कोमल पंखुड़ियों में प्रेम के कारण रात भर कैद रहता है। रक्षा के बंधन को प्रेम की कीमिया दूसरा रूप दे देता है जहां रक्षा की जिम्मेदारी से शक्ति मिलने लगती हैं और बंधन में भी मुक्ति का अनुभव होने लगता है।


धरती पर चल रही विभिन्न विनाश-लीला को देखते हुए ऐसे आस्था के पर्व को प्रकृति से जोड़ना आज जरूरी हो गया है। जिस धरती पर हमने जन्म लिया, जिसकी गोद में पले-बढ़े और जिस धरती के सुरक्षित होने पर हमारी सुरक्षा निर्भर है, वही धरती अब अपनी रक्षा के लिए एक प्रेम पूर्ण बंधन की राह देख रही है। इस रक्षा बंधन में बंधने का मतलब है अपनी सुरक्षा के नए क्षितिज को पैदा करना।


'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे


रक्षाबंधन की शुभकामना 🙏🌹