सीमांत गांधी के इंतजार में अफगानिस्तान
August 23, 2021संवाद
"सीमांत गांधी के इंतजार में अफगानिस्तान"
तालिबानी हिंसा की पृष्ठभूमि में गांधी की अहिंसा की महत्ता और बढ़ जाती है। मासूमों को अपनी छाती से चिपकाई मातायें अपने वतन को छोड़ कर किसी भी सुरक्षित जगह चले जाना चाहती हैं। तालिबान शांति और सुरक्षा का भरोसा दे रहे हैं किंतु पलायन करने वाले लोगों की भीड़ एयरपोर्ट पर इतनी बढ़ती जा रही है कि लोग भगदड़ में मर रहे हैं। तालिबानियों को पंजशीर में चुनौती दी जा रही है किंतु एक के बाद दूसरी जंग इस समस्या का समाधान नहीं है-
"जंग तो खुद ही एक मसला है,
जंग क्या मसअलों का हल देगी।
खून और आग आज बरसेगी,
भूख और एहतियाज कल देगी।।"
अफगानिस्तान कभी ज्ञान और अनुसंधान की भूमि भी थी, इस पर आज कौन विश्वास करेगा। संस्कृत व्याकरण के जनक पाणिनी की जन्मभूमि कंधार था, जिनसे प्रभावित होकर 19वीं सदी में भाषा विज्ञान का जन्म यहीं से हुआ। तक्षशिला जैसा विश्वविख्यात शिक्षा केंद्र भी इसी के आसपास फला-फूला,जहां के आचार्य चाणक्य थे। ऐसे नवाचार की भूमि पर अनाचार और रूढ़िवादिता का पनपना आश्चर्य से भर देता है। लेकिन जब इस क्षेत्र को युद्ध की प्रयोगशाला के रूप में उपयोग किया गया तो कट्टरता और अफीम के धंधे के लिए माकूल आबोहवा तैयार हो गई।
अब जब हिंसा के रास्ते से तालिबान राजधानी काबुल तक पहुंचा है तो उसे सरकार बनाने के लिए अहिंसा का भरोसा देना पड़ रहा है; किंतु लोगों को भरोसा नहीं हो रहा है। यहीं पर साधन और साध्य की पवित्रता का गांधी-सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
"बोए पेड़ बबूल के आम कहां से होय" कहावत भी यही सत्य उजागर कर रही है कि बीज बोते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वृक्ष कैसा होगा और उस पर फल कौन सा लगेगा।
गांधी को यह मालूम था कि हिंसा के बल पर फ्रांस की क्रांति हुई जितना नारा था-स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व। किंतु क्रांति-पुत्र नेपोलियन पूरे यूरोप में हिंसा के शोले ही भड़काता रहा। अतः महात्मा ने भारत को अहिंसा का रास्ता दिखाया। इस रास्ते में छिटपुट हिंसा का भी दौर आया किंतु भारत ने अहिंसा का रास्ता छोड़ा नहीं। इतिहास गवाह है कि जिस किसी भी राष्ट्र ने हिंसा का रास्ता आख्तियार किया, वहां अशांति बढ़ी है और विकास रुक गया है। क्योंकि विकास के लिए शांति आवश्यक शर्त है जो कि अहिंसा के रास्ते से ही संभव है।
काश!आज अफगानिस्तान में कोई गांधी पैदा हो जाए और सारे स्त्री-पुरुषों तथा बाल-वृद्धों को आत्मबल देकर एकत्रित कर सके और अहिंसा के रास्ते सत्याग्रह के लिए आत्म-बलिदान को तैयार कर सके तो अफगानिस्तान में स्वतंत्रता का एक नया सूरज उग आएगा। क्योंकि नूर भरे चेहरे पर खौफ का साया देखा नहीं जाता-
"खून किसी का भी गिरे यहां,
नस्ल-ए-आदम का खून है आखिर
बच्चे सरहद पार के ही सही,
किसी की छाती का सुकून है आखिर।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹