संवाद


"तालिबानी शिक्षा बनाम तिब्बती शिक्षा"


"ऊं श्री कृष्णाय नमः" श्री कृष्ण जन्माष्टमी आशा बंधाती है कि रात कितनी भी अंधकारपूर्ण हो, किसी दीप को जन्म लेने और जलने से नहीं रोक पाती। इस शुभ अवसर पर मेरा ध्यान विश्व में चल रही दो प्रकार की शिक्षाओं पर गया-एक मदरसों में चल रही तालिबानी शिक्षा और दूसरी बौद्ध मठों में चल रही तिब्बती शिक्षा


मरने-मारने की शिक्षा देकर किसी इंसान को अपनी जान देकर भी दूसरे की जान लेने के लिए तैयार किया जा सकता है तो इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है? इतना ही नहीं आतंकी आत्मघाती हमले के पहले इसे बहुत बड़ा मिशन मानते हुए अपने को सौभाग्यशाली समझते हैं और धर्म की खातिर शहादत के बाद जन्नत की आशा भी करते हैं।


फूल से सुंदर चेहरों के मन में न जाने कौन सी नफरत की शूल बोई जाती है कि वे स्वयं के हित और परिवार के हित की भी नहीं सोच पाते। खूबसूरत वादियों में जन्म लेकर और खूबसूरत तन पाकर भी कट्टर शिक्षा से बना मन नरक की सृष्टि कर लेता है। बेगुनाहों-मासूमों का खून बहा देता है और पानी का रंग लाल बना देता है।


जब सरकारों के विरुद्ध ये आतंकी इतनी खतरनाक वारदातों को अंजाम दे देते हैं तो ; जब ये खुद सरकार बना लेंगे तब क्या अंजाम होगा, यह सोच कर मन कांप जाता है।


लेकिन दूसरे ही क्षण मन में यह विचार भी उठता है कि जीने-जिलाने की शिक्षा भी तो इन्हें दी जा सकती है। आखिर दलाई लामा भी तो तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए चीन जैसे सर्वाधिकारवादी सत्ता के विरुद्ध 60 वर्षों से अपना संघर्ष जारी रखे हुए हैं। शरणार्थी के रूप में धर्मशाला में हजारों तिब्बती रह रहे हैं किंतु किसी भी हिंसा की खबर वहां से नहीं आती।


महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं के साथ महात्मा गांधी के सत्य,अहिंसा,प्रेम के रास्ते पर चलते हुए वे अपनी बात पूरे विश्व के सामने रखते हैं,जिसके कारण उन्हें शांति के लिए अंतर्राष्ट्रीय नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा गया।


धर्मशाला जाकर जब उनके ध्यान केंद्रों को देखा तो आश्चर्य हुआ कि पेड़ों को बिना क्षति पहुंचाए हुए उन्होंने अपने भवन बनाए हैं। यह कैसी अद्भुत शिक्षा है? ध्यान, प्रेम, करुणा से तिब्बतियों का मन ऐसा निर्मित हुआ है कि वे अपनी बस्ती बसाने के लिए वृक्षों को ही नहीं बचाते बल्कि उनकी टहनियों को भी बचाकर अपना भवन बनाते हैं। शांति के साथ हजारों परिवार अपना व्यवसाय भी कर रहे हैं और आजादी की लड़ाई भी लड़ रहे हैं।


आगामी पीढ़ियों को बचाना है तो तालिबानी शिक्षा और तिब्बती शिक्षा पर जनजागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। एक आतंकी एक वारदात को क्षणभर में अंजाम देता है तो वह समाचारों की सुर्खियां बन जाता है जबकि एक पूरी कॉम शांति के साथ प्रेम की कायनात बरसों की मेहनत से बना देती हैं और उसके बारे में कोई चर्चा नहीं होती।


दुनिया के सामने दोनों प्रकार की शिक्षा को समान रूप से गंभीर चिंतन-मनन का मुद्दा बनाना होगा क्योंकि-


"ध्वंस बहुत ही सहज मगर निर्माण कठिन है,


पतन बहुत आसान मगर उत्थान कठिन है।।"


पिछले 60 वर्षों में एक तरफ विध्वंस के रास्ते पर चलने वाले लोगों ने क्या खोया क्या पाया, इसका विश्लेषण किया जा सके तो निर्माण व उत्थान के रास्ते पर चलने वाले आंदोलनों की उपलब्धियां और ज्यादा चमक उठेंगी। एक तरफ कोरोना और क्रूरता ने निराशा के गर्त में धकेल दिया है तो दूसरी तरफ करुणा और सहनशीलता ने आशा की लौ जला रखी है।


चुनाव हमें करना है कि तालिबानी या तिब्बती में से हम कौन सी शिक्षा चाहते हैं?


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


श्री कृष्णजन्माष्टमी की शुभकामना 🙏🌹