आशा और आशंका के बीच खुले शिक्षा-संस्थान
September 2, 2021संवाद
"आशा और आशंका के बीच खुले शिक्षा-संस्थान"
शिक्षा संस्थान के खुलने की खुशी का कोई ठिकाना नहीं किंतु इसके साथ ही तीसरी लहर के कारण इस डर का भी कोई पैमाना नहीं कि यह खुशी कितने दिनों तक टिकेगी। क्योंकि-
खफा माझी है मुझसे और मौजों में सफीना है,
खबर मौसम की ये भी है कि बारिश का महीना है
कोरोना ने बहुत सारी बातों का एहसास कराया किंतु सबसे महत्वपूर्ण एहसास यह रहा कि जिस प्रकार से जान बचाने के लिए ऑक्सीजन जरूरी है,उसी प्रकार से जीवन बचाने के लिए शिक्षा-संस्थान।
ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से शिक्षा रूपी ऑक्सीजन सप्लाई की कोशिश की गई किंतु अधिकांश विद्यार्थियों तक यह नहीं पहुंची। जिन विद्यार्थियों तक पहुंची हैं ,उनमें से भी अधिकतर का यह अनुभव रहा कि यह महज खानापूर्ति थी। जिस प्रकार से ऑक्सीजन के अभाव के दिनों में अपरिष्कृत ऑक्सीजन सिलेंडर के उपयोग से ब्लैक-फंगस का दुष्प्रभाव देखने को मिला, उसी प्रकार से शिक्षक से साक्षात् संपर्क के अभाव में पढ़ाई में अरुचि और बोरियत का दुष्प्रभाव विद्यार्थियों में देखने को मिला। इन कमियों के बावजूद ऑनलाइन शिक्षा का आभार मानना पड़ेगा क्योंकि जिनके पास सुविधाएं थीं और जो सजग थे, उन्होंने इसका लाभ पाया।
आज विद्यार्थी ही नहीं, शिक्षक के साथ समाज भी शिक्षा-संस्थान के ऊपर लगे ग्रहण के हटने से काफी खुश हैं किंतु इस खुशी में यह ध्यान रखना होगा कि अत्यंत पास आए तो कोरोना फैलेगा और ज्यादा दूर हुए तो अशिक्षा। यह अग्नि-परीक्षा है। अग्नि के ज्यादा पास आओ तो वह जला देगी और दूर जाओ तो ताप तथा रोशनी नहीं मिलेगी। करोड़ों विद्यार्थी शिक्षा-संस्थान के बंद होने से शिक्षा से दूर हो चुके हैं, उनको शिक्षालय में वापस बुला लेना और उन्हें फिर पढ़ाई में प्रवेश करा देना; बहुत मुश्किल काम दिखाई देता है। किंतु बहुत मुश्किल को बहुत आसान बना देने की कला का नाम ही शिक्षा है।
दूसरी लहर के पहले शिक्षा संस्थान के खुलते ही तेजी से सिलेबस को पूरा करने का कार्य शुरू किया गया था किंतु नियति को कुछ और मंजूर था जिसके कारण भयावह दृश्य हमारे दिलों-दिमाग पर दहशत के अमिट छाप छोड़ गए।
तीसरी लहर के कारण फिलीपींस में ऑक्सीजन की भारी किल्लत हो गई है औरअस्पतालों में जगह कम पड़ने के कारण चर्चों में इलाज चल रहा है। केरल और महाराष्ट्र में भी स्थिति चिंता पैदा करने वाली है। इस पृष्ठभूमि में शिक्षा संस्थान की भूमिका सबसे बड़े महत्व की हो जाती है। सिलेबस पूरा कराने के साथ नागरिक-धर्म और आपत्कालीन-धर्म के लिए भी शिक्षा-संस्थान पीढ़ियों को तैयार करे, ऐसी अपेक्षा की जाती है।
किंतु सरकार और समाज की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि महामारी के समय की चुनौतियों का सामना करने वाली शिक्षा देने के लिए शिक्षकों को अनुकूल परिस्थिति और मन:स्थिति प्रदान करे।
"यतो धर्मस्ततो जय:" महाभारत का यह उद्घोष बताता है कि यदि हम सभी अपने धर्म का पालन करेंगे तो निश्चितरुपेण विजयी होंगे।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹