संवाद


"शिक्षक का धर्म-संकट"


शिक्षक आज बहुत बड़ी पीड़ा में है। पीड़ा इस बात की कि यदि शिक्षक झूठ बोलता है तो उसका शिक्षकत्व नष्ट हो जाता है और सच बोलता है तो व्यवस्था बेनकाब हो जाती है-


झूठ बोलूं तो मेरी आकबत बिगड़त है,


जो सच बोलूं तो खुदी बेनकाब हो जाए।


विश्वविद्यालय की उत्तर-पुस्तिका का जांच-कार्य प्रगति पर है। कॉपियां देखकर शिक्षक सदमे में हैं क्योंकि विद्यार्थी बामुश्किल पास करने लायक मिल रहे हैं। ईमानदारी से कॉपी जांच की जाए तो रिजल्ट 5% से 10% ही होगा; और यदि बेईमानी की जाए तो आत्मा धिक्कारती है।-


बहुत करीब न आओ यकीं नहीं होगा,


ये आरजू भी अगर कामयाब हो जाए।


आज शिक्षक को धर्म- संकट में डाल दिया गया है। हर शिक्षक की शिकायत है कि मैं जिस विषय को पढ़ाने के लिए आया था,उसके लिए इस व्यवस्था में कोई जगह नहीं है। शिक्षालय को कार्यालय बना दिया गया है जहां प्राथमिकता से एडमिशन, एग्जामिनेशन, इलेक्शन और इंफॉर्मेशन का कार्य किया जाता है।


क्लास-टीचिंग की नियमितता और निश्चितता के अभाव में विद्यार्थी कॉलेज छोड़कर ट्यूशन पर जाने लगे। ट्यूशन-कोचिंग में एग्जाम ओरिएंटेड पढ़ाई से विषय में रुचि जाग्रत नहीं हो सकी; अतः ज्यादा शॉर्टकट के चक्कर में पासबुक-कल्चर आया। और अब तो लास्ट मिनट पासबुक को भी बिना ठीक से पढ़े हुए विद्यार्थी परीक्षा दे रहे हैं। और रिजल्ट अच्छा दिखाने हेतु हम उसे पास करने को बाध्य है।


क्या यह सामूहिक-आत्मघात नहीं है?


इस परिस्थिति में शिक्षक दिवस के दिन शिक्षक की महानता के गीत गाए जाएंगे और उसे सुनकर शिक्षक मतिभ्रम का शिकार हो जाएंगे। _एक तरफ अहर्निश पढ़ने-पढ़ाने वाले तथा विद्यार्थियों के लिए दिन-रात जीने वाले उन महान शिक्षकों की ओर देखता हूं_तो गौरव की अनुभूति होती है और दूसरी तरफ फाइलों और सूचनाओं में उलझे रहने वाले अपने जीवन की ओर देखता हूं तो हीनभावना घिर आती हैं।


शिक्षक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वर्तमान हालात में वह अपने विषय ज्ञान को विद्यार्थियों तक पहुंचाने के लिए क्लास- टीचिंग को कैसे प्राथमिकता पर लाए और गुणवत्तायुक्त बनाए। यदि शिक्षालय-समय का विद्यार्थी हित में उपयोग हो सका तो विद्यार्थी ट्यूशन या कोचिंग पर नहीं जाएंगे और पासबुक की जगह मौलिक पुस्तकों से जुड़ेंगे। शिक्षक के ज्ञान और प्रेम से विद्यार्थी का चरित्र निर्माण भी होगा और शिक्षक के साथ शिक्षालय भी समाज में प्रतिष्ठित होगा।


नई शिक्षा नीति में यह बात कही गई है कि शिक्षक को पढ़ाने के अतिरिक्त अन्य कार्यों से मुक्त रखा जाएगा किंतु इसे व्यवहार में कब लाया जाएगा यह बात नहीं बताई गई है।


5 से 17 सितंबर तक शिक्षक-पर्व मनाया जा रहा है। शिक्षकों की भारी कमी के बावजूद शिक्षकों को अन्य कार्यों में लगाने से भावी पीढ़ी का जीवन खतरे में पड़ता जा रहा है । अतः शिक्षक-दिवस पर शिक्षकों की एक ही आरजू है-


"शिक्षक सिर्फ पढ़ाई के लिए।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


शिक्षक-दिवस की शुभकामना 🙏🌹