साक्षरता या शिक्षा:वरदान या अभिशाप?
September 7, 2021संवाद
"साक्षरता या शिक्षा:वरदान या अभिशाप?"
8 सितंबर 'विश्व साक्षरता दिवस' निरक्षरता के अभिशाप को मिटाकर सभी को साक्षर और शिक्षित बनाने का संकल्प दिवस है।
"Literacy for a human centered recovery:Narrowing the digital divide" ("मानव केंद्रित पुनर्प्राप्ति के लिए साक्षरता: डिजिटल विभाजन को कम करना")वर्ष 2021 की थीम है। इसके तहत लक्ष्य है कि बढ़ती डिजिटल असमानता को दूर किया जाए और मानव में मानवीय-मूल्य बढ़ाने वाली साक्षरता या शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए।
किंतु अक्षर ज्ञान की ज्योति जलने के बाद यदि अंधकार और ज्यादा बढ़ जाए और शिक्षा के बाद इंसान के सीने में जलन और आंखों में बढ़ता तूफान जीना मुश्किल कर दे तो "साक्षरता या शिक्षा:वरदान या अभिशाप" ऐसे प्रश्न पर बहस छिड़ जाती है। जब तथाकथित शिक्षितों द्वारा स्त्री-शिक्षा पर प्रतिबंध या वर्जनाएं लादी जाती हैं तो यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
तथाकथित शिक्षितों का जीवन निरक्षरों से भी ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है। सोशल मीडिया पर जो अक्षर लिखे जा रहे हैं,वे मस्तिष्क में सांप्रदायिक रंग को घोल रहे हैं-यह चिंता सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों ने जाहिर की है। हर बात की व्याख्या इस तरह से की जा रही है कि स्वयं को आदमी समझना मुश्किल होता चला जा रहा है। धर्म या जाति का लेबल हर एक माथे पर चिपकाया जा रहा है-
फिर रहा है आदमी भूला हुआ ,भटका हुआ
एक न एक लेबल हर एक माथे पर है लटका हुआ
आखिर इंसान तंग सांचों में ढल जाता है क्यूं,
आदमी कहते हुए अपने को शरमाता है क्यूं?
भगवान आशुतोष ने भस्मासुर को यह वरदान दे दिया कि जिसके भी सर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। कथा कहती है कि वह सबसे पहले भगवान शंकर के ही सर पर हाथ रखने के लिए दौड़ा। सोशल मीडिया के द्वारा दिमाग में घृणा के बीज बोने वाले तथाकथित शिक्षित इस बात को समझ लें कि जिसको घृणा करने की लत लग गई वह फिर किसी को भी प्रेम नहीं कर पाएगा। आज धर्म के नाम पर फैली घृणा कल मंदिर या मस्जिद को जलाएगी किंतु इसके बाद वह सभी घरों को भी जलाएगी।
'मसि कागद छुओ नहीं, कलम गहि नहिं हाथ'की उद्घोषणा करने वाले कबीर कह सके कि 'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।' अक्षर ज्ञान पाकर और शिक्षित होकर जो लोग एक एक अक्षर को शूल बना रहे हैं उनकी दुनिया में बच्चियों को या तो कोख में ही मार दिया जा रहा है अथवा पर्दे में रहने या बुर्का पहनने को बाध्य किया जा रहा है। फिर वहां मासूमों के लिए घर-परिवार नहीं होता बल्कि यातना-शिविर होता है। जवानी वहां विकलांग बनकर कराहती है। बूढ़े बाप के कंधे पर बेटों के जनाजे निकलते हैं।
ऐसे दृश्यों को देखने के बाद एक बहुत बड़े विद्वान का कथन बरबस याद आ जाता है कि अगली पीढ़ियों को बचाना है तो सारे स्कूल- कॉलेजों को बंद कर दो।
मेरी राय में अब पीछे नहीं लौटा जा सकता। धर्म का वैज्ञानिक स्वरूप निखारने में और विज्ञान का सृजनात्मक उपयोग करने में ही मानव कल्याण निहित है।-
क्षर लिख-लिख तू रहा निरक्षर, अक्षर सदा अलेखा
देखे को अनदेखा कर दे, अनदेखे को देखा।।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹