मूलाधार को न हिलाए नवाचार
September 12, 2021संवाद
"मूलाधार को न हिलाए नवाचार"
युवा कौशल विकास( RSLDC ) में शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार की खबर ने चिंता एवं चिंतन में डुबो दिया। क्योंकि(1) यह शिक्षा-जगत से जुड़ा हुआ मामला है जो समाज में संस्कार के बीज बोता है और(2) RSLDC द्वारा बेरोजगारों को रोजगार के नए स्किल सिखा कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना इसका मूल उद्देश्य था।
इसके लिए शिक्षा-संस्थान एवं शिक्षकों ने अपना बहुमूल्य समय एवं उर्जा लगाया था। English spoken से ब्यूटी पार्लर तक के सैकड़ों कोर्सेज को शुरू करना आसान काम नहीं था और उसके लिए व्यवस्था जुटाना तो उससे भी मुश्किल काम था।
इस ट्रेंनिंग कोर्सेज की टाइमिंग शिक्षालय की टाइमिंग खत्म होने के बाद शुरू होती थी, अतः विद्यार्थियों को इसके लिए ढूंढ पाना और तैयार करना आसमान से तारे तोड़ लाने के बराबर था।
शिक्षकों द्वारा बहुत समझाने के बाद विद्यार्थियों ने फॉर्म तो भर दिए किंतु क्लासेज शुरु होने पर वे उपस्थित नहीं हुए। दूरदराज से आने वाले विद्यार्थियों के लिए 5 घंटे की क्लास-टीचिंग के बाद ट्रेनिंग-कोर्सेज के लिए उपस्थित होना संभव नहीं हुआ।
कॉलेज में इंग्लिश के प्रोफेसर रहते हुए इंग्लिश स्पोकन की क्लास कोई अपेक्षाकृत कम योग्यता वाला बाहरी ट्रेनर लेता था, यह बात न विद्यार्थी को समझ आ रही थी और न प्रोफेसर को।
एक तरफ विद्यार्थियों की उदासीनता के कारण ट्रेनिंग कोर्सेज नहीं चल पाए और दूसरी तरफ प्रोफेसरों के सब्जेक्ट की क्लासेज भी बहुत प्रभावित हुई।
इसके बाद वित्तीय अनियमितताओं की जो खबरें आ रही हैं, वह नवाचार के नाम पर चल रहे भ्रष्टाचार के कारण नवाचार पर नए सिरे से सोचने को मजबूर कर रही हैं।
शिक्षा-जगत में नवाचार बहुत अच्छी बात है क्योंकि देश-काल की परिस्थिति के अनुसार शिक्षा अपने आप को तैयार भी करती है और बदलती भी है। किंतु नवाचार के नाम पर मूलाधार (क्लास)को नहीं हिलाया जाना चाहिए; क्योंकि
(१) विद्यार्थी कॉलेज में अपने पाठ्यक्रम को पूरा करने के उद्देश्य से आते हैं। उनके उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विषय-विशेषज्ञ ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश होता है।
किसी भी कारण से एक शिक्षक के क्लास में न आने से अनेकों विद्यार्थियों का जीवन प्रभावित होता है।
(२)सब्जेक्ट में मनोरंजक तरीके से विद्यार्थियों को प्रवेश कराने की सामर्थ्य सिर्फ शिक्षक के पास होती है, अतः क्लास का निर्विघ्न और नियमित संचालन शिक्षा-जगत के लिए सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए।
(३)यदि कोई परंपरागत सब्जेक्ट रोजगारपरक नहीं है तो उसे रोजगारपरक बनाने में उस विषय के विशेषज्ञ की ही महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
(४)नवाचार के नाम पर यदि कोई नया सब्जेक्ट पढ़ाना भी है तो उसके लिए अलग से पूरा सेटअप की जरूरत होती है। उसकी व्यवस्था नहीं करने पर पुराना सेटअप पूरी तरह से लड़खड़ा जाता है।
(५)शैक्षिक गतिविधियों के संचालन के साथ शैक्षिकेतर गतिविधियों का दायित्व भी शिक्षक का होता है। उसमें अपनी भूमिका निभाकर विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षक प्रयत्नशील रहता है।
किंतु जब क्लास-टीचिंग की उपेक्षा की जाए तो विद्यार्थियों का आकर्षण अपने शिक्षालय के प्रति कम होता चला जाता है। इससे एक तरफ शिक्षकों को अपनी निरर्थकता का एहसास होने लगता है तो दूसरी तरफ विद्यार्थी को अपनी उद्देश्यहीनता का। नियमित क्लासेज के अभाव में कॉलेज सूने पड़ने लगते हैं और ट्यूशन-कोचिंग गुलजार होने लगते हैं। किंतु बांसवाड़ा जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में गरीब विद्यार्थियों के पास तो खाने के लिए भी पैसे पर्याप्त नहीं होते, तो वे ट्यूशन पर कहां से जाएंगे? उनके लिए तो क्लास छूटने का मतलब है-पढ़ाई छूट जाना।
अच्छे नवाचारों ने निश्चितरूपेण शिक्षाजगत में क्रांति लाई हैं किंतु जो नवाचार परंपरागत क्लास-टीचिंग को प्रभावित करता है,वह वरदान बनने की जगह अभिशाप होता जा रहा है; क्योंकि-
परंपरा जब लुप्त हो जाती हैं
तो लोगों की आस्था के आधार टूट जाते हैं
उखड़े हुए पेड़ों के समान,
वे अपनी जड़ों से छूट जाते हैं।।
शिक्षा-संस्थान के लिए अध्ययन-अध्यापन जड़(Root)है। जड़ जितनी गहरी जाती है, उसका धड़ उतना ही आकाश को छूता है। जड़ों को खाद-पानी दिए जाने की जरूरत है, फिर वृक्ष पर पत्तियां, फूल और फल अपने-आप आने लगते हैं।
अतः नवाचारों पर विद्यार्थियों के साथ शिक्षकों की विशेष सलाह ली जानी चाहिए और उनका अनुभव व फीडबैक भी। क्योंकि विद्यार्थियों की क्षमता और मनोदशा को शिक्षक से बेहतर कोई नहीं जानता।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹