संवाद


"हिंदी में शिक्षा और शिक्षा में हिंदी"


नई शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान किया गया। किंतु इसकी अनिवार्यता को लेकर विरोध शुरू हुआ जिसके कारण इसकी अनिवार्यता को खत्म कर दिया गया।


चारों तरफ इंग्लिश स्कूल का बोलबाला है और सरकारें भी अंग्रेजी मीडियम स्कूल खोलने के लिए विशेष प्रयास कर रही हैं। यह अंग्रेजी के प्रति प्रेम नहीं हैं बल्कि अंग्रेजी का उपयोग है अच्छी नौकरी पाने के लिए। जब शिक्षा रोजगार-केंद्रित हो जाए तो व्यक्ति भाषा का चुनाव मस्तिष्क से करता है। यदि शिक्षा जीवन-केंद्रित हो सके तो भाषा का चुनाव मस्तिष्क की जगह हृदय से होगा।


गरीब से गरीब तबका भी हिंदी माध्यम के स्कूल में दाखिला लेना नहीं चाहता। यह हिंदी के प्रति नफरत नहीं है बल्कि अंग्रेजी पढ़कर रोजगार पाने का लोभ उसे आकर्षित कर रहा है।


शनै:-शनै: वह टूटी- फूटी अंग्रेजी में पारंगत हो जाएगा और हिंदी से बहुत दूर हो जाएगा।


मेरे अनुभव में एक बात आई कि इंग्लिश स्कूल में पढ़ने के बावजूदअधिकतर विद्यार्थियों का अंग्रेजी-ज्ञान मात्र कामचलाऊ है; किंतु हिंदी से वे पूरी तरह से कट जाते हैं। अंग्रेजी में मौलिकता उनकी हो नहीं सकती क्योंकि वह अपनी भाषा नहीं है; और हिंदी की उपेक्षा हो गई जिसमें वे अपनी कविताएं,कहानियां लिखकर हृदय के भावों को अभिव्यक्त कर सकते थे।


एक तो देश में शिक्षा पर खर्च किया जाने वाला बजट बहुत कम है और उस बजट का अधिकांश हिस्सा अंग्रेजी को चला जाए तो हिंदी के लिए बहुत कम गुंजाइश शेष रह जाती है।


रोजगार के कारण अंग्रेजी के मोहपाश में बंधने वाली पीढ़ी अपनी मातृभाषा हिंदी से कटकर किसी वृक्ष की डालियों से टूटे हुए पत्ते के समान हो जाती है-


'शाख से पत्ता अगर कोई जुदा हो जाएगा


हादसों का फिर शुरू एक सिलसिला हो जाएगा।'


अपनी मातृभाषा से कटकर व्यक्ति सुख-सुविधाओं को प्राप्त भी कर लेता है तो भी बहुत अधूरा सा जीवन जीता है। क्योंकि जीवन की पूर्णता हृदय के साथ जीने में हैं। धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने के चक्कर में वह हिंदी में तुतलाना भी भूल जाता है। अपनों के साथ उसके संबंध औपचारिक रह जाते हैं। फिर जीवन में अपनापन का भाव खत्म होता जाता है और अलग-थलग होने का भाव प्रगाढ़ होता चला जाता है-


"शिकायतें तो बहुत सी है मगर तुमसे नहीं,


जो भी रहेगा इस शहर में बेवफा हो जाएगा।।"


आज की शिक्षा यदि पूर्णत: व्यावसायिक हो गई है और विद्यार्थियों के लिए तनाव औरआत्महत्या का कारण बनती जा रही है तो उसके मूल में बहुत बड़ा कारण अपनी मातृभाषा में शिक्षा का न होना है।


नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में शिक्षा पर जोर तो दिया गया किंतु इसके लिए मातृभाषा और स्थानीय भाषाओं के शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की गई। अलग से इसके लिए कोई बजट का प्रावधान भी नहीं है।


अर्थात् हिंदी के प्रति प्रेम-प्रदर्शन की राजनीति चल रही है;अन्यथा बीमारू राज्यों की गिनती में अधिकतर हिंदी-भाषी प्रदेश नहीं होते।


सरकारी उदासीनता के बावजूद संस्कृत की बेटी हिंदी की शब्द संपदा और साहित्य संपदा बहुत बड़ी शक्ति है और उसी शक्ति की बदौलत हिंदी निरंतर आगे बढ़ती जा रही है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


हिंदी दिवस की शुभकामना 🙏🌹