संवाद


"नीट परीक्षा या चीट परीक्षा"


इस शीर्षक को समाचार-पत्र की सुर्खियों में देखकर और इस कांड में शिक्षकों से लेकर मेधावी विद्यार्थियों तक की संलिप्तता को जानकर मुझे भारतीय मनीषियों का स्मरण हो आया जो अपने शिष्यों को सुफल होने का आशीर्वाद देते थे,सफल होने का नहीं।


जिस समाज के केंद्र में सिर्फ सफलता हो और वह भी किसी भी कीमत पर; उस व्यवस्था में कोचिंग उच्चतम-तल पर होगा और शिक्षालय निम्नतम-तल पर अर्थात् डमी(dummy)।


लाखों रुपए देकर हम बच्चों को कोचिंग में भेज रहे हैं और फिर करोड़ों रुपए देकर परीक्षा में सफलता की गारंटी चाहते हैं। इसके बाद वह किसी भी जुगाड़ से एमबीबीएस की डिग्री लेकर डॉक्टर बन गया तो उन मरीजों का क्या हाल होगा जिसका वह इलाज करेगा, उस हॉस्पिटल का क्या हाल होगा जहां पर वह काम करेगा, उस मोहल्ले का क्या हाल होगा जहां पर वह रहेगा और फिर उस परिवार का क्या हाल होगा जिसका वह सदस्य होगा।


सबसे महंगी पढ़ाई डॉक्टरी(MBBS)की पढ़ाई है। मध्यमवर्ग अपनी जमीन,जायदाद बेच दे तो मुश्किल से एक बेटा या बेटी को डॉक्टर बना पाता है। लेकिन डॉक्टर बनने की कोचिंग से लेकर डिग्री पाने तक की विद्यार्थी की यात्रा नरक की यात्रा है, जिसमें वह सदैव मां-बाप की महत्वाकांक्षाओं के दबाव में रहता है, फिर ट्यूटरों की परीक्षा पास होने की नीरस तकनीकों को रटने के दबाव को झेलता है, और अंत में मशीन बनकर डॉक्टर की डिग्री पा लेता है।


महामारी की दूसरी लहर में जब हॉस्पिटल में बेड पाने के लिए बोली लग रही थी, ऑक्सीजन पाने के लिए मुंहमांगी कीमत दी जा रही थी, नकली वेंटिलेटर पर रखकर दम तोड़ चुके मरीजों के परिजनों से लाखों रुपए की वसूली की जा रही थी और प्राणरक्षक दवाइयों की कालाबाजारी में समाज के व्हाइटकलर लोगों की चांदी हो रही थी; उस समय यह समझ में नहीं आ रहा था कि क्षणभंगुर दुनिया में चिकित्सा जैसे देव-तुल्य पेशे में कोई पैसा बनाने के लिए इतना निर्दयी और निर्लज्ज कैसे हो सकता है?


अब समझ में आने लगा कि सफलता की गारंटी देने वाले कोचिंग में जो पूरी प्रक्रिया है वह इंसान को मशीन बनाने की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में मां-बाप, परिवार,समाज और व्यावसायिक बुद्धि वाले लोगों के साथ उच्च-पदस्थ सरकारी लोग भी शामिल हैं।


क्या इस मकड़जाल से निकलने का कोई रास्ता है?


रास्ता तो यह है कि सफलता नहीं, सुफलता केंद्र में हो। कोचिंग नहीं , शिक्षालयों में क्लास को पुनर्प्रतिष्ठित किया जाए। समान सिलेबस हो और समान शिक्षा की पूरी व्यवस्था की जाए।


आज भी समाज में सादा जीवन,उच्च विचार वाले शिक्षक मौजूद हैं जिनके सान्निध्य-मात्र से विद्यार्थी में ज्ञान के साथ चरित्र का बीज बोया जा सकता है; किंतु योजनापूर्वक शिक्षालयों के क्लास को सूना बनाया जा रहा है और कोचिंग को गुलजार।


यहां तक कि क्लास-टाइम में अनेक प्रकार के कार्यक्रम और योजना चलाकर शिक्षणवृत्ति की जगह कोचिंगवृत्ति को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे भी ज्यादा खतरनाक बात यह है कि अच्छे शिक्षकों को कोचिंग की ओर जाने को मजबूर किया जा रहा है।


एक प्रश्न सोचने जैसा है कि जो शिक्षक क्लास में पढ़ा कर विद्यार्थी को प्रतियोगिता परीक्षा में पास करने योग्य नहीं बना सकता, वही शिक्षक कोचिंग में पढ़ा कर विद्यार्थी को कंपिटीशन में टॉप करने योग्य कैसे बना लेता है?


5 विद्यार्थी को नीट परीक्षा में चीट से पास करवाओ और 50 सफल विद्यार्थियों को पैसा देकर अपने कोचिंग संस्थान का नाम दिलवाओ, फिर हर अखबार में इसे छपवाओ; सफलता की गारंटी समाज तक पहुंचाओ फिर तुम्हारे पास एडमिशन लेने के लिए 500 नहीं ,5000 विद्यार्थी लाइन में लगे होंगे।


मेरे भी मासूम खतरे में और तेरे भी


मैं भी सोचूं, तू भी सोच;


सफलता की गारंटी की क्या कीमत है??


मैं भी सोचूं ,तू भी सोच।।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


रामदेव जयंती की शुभकामना🙏🌹