एक संन्यासी की आत्महत्या?
September 22, 2021संवाद
"एक संन्यासी की आत्महत्या?"
महंत नरेंद्र गिरि जी की खबर ज्यों ही टीवी पर आई, घर में बच्चे की त्वरित स्वाभाविक पहली प्रतिक्रिया थी- "संन्यासी और आत्महत्या?"
सनातन हिंदू परंपरा ने विश्व को जो सबसे अनूठी देनें दी हैं ,उसमें एक संन्यास की परंपरा भी है। इसमें जिंदा रहते ही अपना पिंड-दान देकर समाज के लिए अपने आप को होशपूर्वक मृत घोषित कर दिया जाता है। फिर संन्यासी समाज के मान-अपमान, हानि-लाभ की चिंता नहीं करता, वह अनूठे तंत्र और छंद में जीता है- स्वतंत्र और स्वच्छंद होकर। जिन दुखों से भागकर लोग आत्महत्या करते हैं, उन दुखों को संन्यासी आत्म-रूपांतरण कर सहर्ष स्वीकार कर लेता है।
गौतम महल की सुख-सुविधाओं को छोड़कर जंगल के कंटकाकीर्ण जीवन को स्वीकार कर बुद्ध बन जाते हैं। फिर उनकी अपनी ही शिष्या सुंदरी ने दूसरों के बहकावे में आकर उन पर व्यभिचार का आरोप लगाया था। किंतु संन्यासी गौतम ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि इस आग से गुजरे तथा कुंदन की तरह और निखर गए जिसके कारण महात्मा बुद्ध बन गए।
इस दुर्घटना का सबसे दुखद पहलू यह है कि तथाकथित आत्महत्या के आरोप में शिष्य 'आनंद गिरी 'हिरासत में है ,इससेअद्भुत शिष्य गुरु परंपरा पर आंच आई है-
"गुरु शिष्य का यह शुभ-नाता,
सोचों पावन है कितना
हिमगिरी के शिखरों से निकले
गंगा-मां के जल जितना।"
मंदिर-मठ-आश्रम भारतीय ज्ञान परंपरा के धरोहर रहे हैं। अतः समाज की गहरी आस्था इन पर बनी रही और मुक्त-हस्त से इनको दान भी मिलता रहा। इनकी शिक्षा-दीक्षा के कारण राजाओं को अपने राज्य में शांति और सौहार्द बनाने में बहुत मदद मिलती थी। तभी तो गुरु-वरतंतु के शिष्य-कौत्स के द्वारा गुरु-दक्षिणा हेतु करोड़ों स्वर्ण मुद्रा मांगने पर राजा रघु इंकार नहीं करते बल्कि राजकोष में कम धन होने पर कुबेर के पास से लाते हैं।
"इस नाते की मर्यादा को निभा सकें हम कुछ ऐसे ,
गुरुवर रामकृष्ण बन जाएं, शिष्य विवेकानंद जैसे।"
नरेंद्र को विवेक तथा आनंद देने वाली यह गुरु शिष्य परंपरा कलंकित न हो, इसकी जिम्मेवारी सबकी है। अतः इसका सच सामने आना चाहिए।
अपवादस्वरूप दुर्घटनाएं घटती हैं और घटती रही हैं। किंतु ऐसी दुर्घटनाएं आत्मालोचना और आत्म-परिष्कार हेतु उपयोग कर ली जाए तो अभिशाप की जगह वरदान भी बन जाती हैं-
अगर स्वार्थमय अंधे युग में बस इतना हो जाए जो
वही पुराना नातों में फिर अपनापन आ जाए जो।
हर उद्देश्य सफल होगा,तब हर मंजिल मिल जाएगी
नातों की मुरझाई कलिका वह फिर से खिल जाएगी।।"
परमात्मा से प्रार्थना है कि दिवंगत महंत की आत्मा को शांति मिले और हम सभी को यह शक्ति मिले कि सनातन संस्कृति की संन्यास परंपरा पर जमा हो गई राख को झाड़ कर अंगारे को बचा सकें।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹