दुख ही दुख ज्यादा है जग में
September 24, 2021संवाद
"दुख ही दुख ज्यादा है जग में"
इंसान कितना भी अच्छा हो और उसके पास कितना भी ज्ञान तथा संपत्ति हो; फिर भी उसे जीवन का दुख उतना भोगना ही पड़ता है, जितना विधाता ने उसके भाग्य में लिखा है।
अचानक खबर मिली कि आदर्श शिक्षिका के इकलौते जवान बेटे की पोस्ट कोविड-इफेक्ट में हार्ट- अटैक से मृत्यु हो गई। आंखों का तारा और बुढ़ापे का सहारा असमय चला गया। अपने पीछे तीन छोटी-छोटी बच्चियों के साथ विधवा पत्नी को छोड़ गया। अब वृद्ध मां-बाप के पास जाकर कोई सांत्वना के कौन सा शब्द बोले,यह समझ नहीं आता।
साहित्यिक ऊंचाई के आकाश में उड़ने वाली वह शिक्षिका धनी परिवार में विवाह होने के बावजूद अपने वजूद की तलाश में एम.ए.(हिंदी) में गोल्ड मेडलिस्ट बनीं और अपने इकलौते बेटे को अच्छी तालीम व संस्कार देने के लिए बिहार से बांसवाड़ा आई, कॉलेज व्याख्याता के रूप में चयनित होकर। उनकी जीवटता और जुझारूपन कॉलेज के माहौल को आंदोलित किए रहता था।
लगभग 10 वर्ष पहले अपने रिटायरमेंट के अवसर पर उन्होंने कहा था कि शिक्षा के महल को खंडहर में तब्दील होने के पहले मैं ठीक समय पर जा रही हूं। गैर शैक्षिक कार्यों की मात्रा और महत्ता जितनी बढ़ती जा रही हैं,उसे देखकर लगता है कि एक दिन पढ़ना और पढ़ाना अपराध सा हो जाएगा। आज उनके शब्द मुझे सच होते हुए प्रतीत हो रहे हैैं।
सेवानिवृत्ति के बाद उनका सपना था कि अपने ज्ञान और अनुभव को शब्दों में पिरोकर समाज के सामने परोसा जाए। किंतु विधाता को कुछ और मंजूर था।
उनकी बहू दूसरी बच्ची को जन्म देते ही ऑपरेशन के दौरान चल बसी। मां और दादी की भूमिका एक साथ निभाते हुए उन्होंने हार नहीं मानी और जीवन को आगे बढ़ाया।
लेकिन भाग्य में कुछ और लिखा था। अचानक उनका स्मृति लोप हो गया। नए-नए शब्दों को गढ़ने वाली निष्णात विदुषी शब्दों को पढ़ने में असमर्थ हो गई। जफर का एक शेर है-
"मुझे फांसी पर चढ़ाने की जरूरत क्या है,
मेरे हाथों से कलम छीन लो मैं मर जाऊंगा।"
मैं उनसे मिलने जाया करता था और घंटों बातें करता था। हर मुद्दे पर उनकी सूक्ष्म दृष्टि और अनूठा विचार देख-सुनकर यह आश्चर्य होता था कि यह कैसा रोग है,जिसके इलाज में डॉक्टर ने क ख ग से फिर पढ़ाई शुरू करने को कहा है क्योंकि जीवन भर कलम चलाने वाली साधिका कलम शब्द लिखा हुआ नहीं पढ़ पाती थी।
लेकिन जीवन जिस मोड़ पर लाया, उसे कुबूल करने का उन्होंने हौसला दिखाया।
जब मैं कन्या महाविद्यालय का प्राचार्य था तो पुरस्कार वितरण हेतु उन्हें आग्रहपूर्वक सादर निमंत्रित किया। उन्होंने कहा कि कब मेरी स्मृति चली जाएगी और मैं लिखा हुआ भी नहीं पढ़ पाऊंगी तो आपका प्रोग्राम बिगड़ जाएगा। मैंने कहा कि इसकी चिंता छोड़िए।आपका मंच पर खड़ा होना और आपके कर कमलों से प्रतिभाओं को पुरस्कार देने का पल बहुत दिनों तक माहौल को प्रेरित करता रहेगा। कन्या महाविद्यालय के कॉलेज मंच से दिया गया उनका संक्षिप्त भाषण आज भी दिलों में आसन जमाए बैठा है।
कोविड की दूसरी लहर के दौरान रिश्तेदारी में दो जवान मौतें हुई। चारों तरफ दुख का आलम था,उसमें अपना दुख व्यक्ति किसी प्रकार से झेल गया।
अब तो हालात सामान्य हो गए और पर्व-त्योहारों की रौनक लौटने लगी।उसमें पोस्ट कोविड-इफेक्ट ने एक तरफ विशेष मुख्यमंत्री जी तक को चपेट में ले लिया और दूसरी तरफ सामान्य घरों के चराग को बुझा दिया।
जीवन इतना भयाक्रांत और अनिश्चित हो गया है कि किसी को कुछ भी पता नहीं चल रहा। ऐसा लगता है-
"दुख ही दुख ज्यादा है जग में,
सुख के क्षण तो अल्प है
सौ आंसू पर एक हंसी ,
यह विधना का संकल्प है।
उस निष्ठुर खिलाड़ी का तो
यह बहुत निठुर खिलवाड़ है
विधना के बस इसी खेल में
यह मिट्टी लाचार हैं।।"
परमात्मा दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और परिजनों को दुख सहने की शक्ति दे । ओम् शांति: शांति: शांति:...
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹