नीति और नीयत
September 27, 2021संवाद
"नीति और नीयत"
नीति और नीयत सही होने पर सरकार और समाज के परस्पर-सहयोग से कितना बड़ा काम किया जा सकता है, इसका उदाहरण है- रीट की महापरीक्षा का सफल आयोजन।
कोरोना के कुशल प्रबंधन में सफल सरकार को जब दरियादिल-समाज का सहयोग मिला तो नामुमकिन सी लगने वाली मंजिल भी मुमकिन हो गई -
सहल हो गई मंजिलें, सख्त हालात भी बदल गए
तेरा हाथ हाथ में आ गया तो चराग राह में जल गए
OBSERVER के रूप में मैंने नजदीक से देखा कि लोगों में सहयोग की कितनी भावना भरी हुई है कि जिसके पास स्वयं के खाने के बहुत ज्यादा पैसे नहीं हैं, वह भी मेरे परीक्षा-सेंटर पर अपनी तरफ से परीक्षार्थियों के लिए नाश्ता तैयार करके लाया था।
सरकार की अपील पर समाज ने जो सहयोग किया है,वह काबिले तारीफ है किंतु कुछ बातें विचारणीय भी हैं।
परीक्षा सेंटर दूर देना, इंटरनेट सेवा बंद करना, कई स्तरों पर चेकिंग की व्यवस्था करना जैसे अनेक नीतियों-नियमों के बावजूद ऐसा नहीं कहा जा सकता कि परीक्षा में मुन्नाभाइयों और नकल गिरोहों ने अपना कमाल नहीं दिखाया। नीति-नियम जितने बढ़ते जा रहे हैं, उसमें तोड़ ढूंढने वाले उतने ही नए-नए तरीके ईजाद करते जा रहे हैं। थोड़े से गलत नीयत वाले लोगों के कारण बहुत सारे लोगों को बहुत प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ा है।
दिन-रात एक करके भी सड़क दुर्घटना में होने वाली परीक्षार्थियों की मौतों को नहीं रोका जा सका और लंबी दूरी की परेशानियों व खर्चों से नहीं बचाया सका।
26लाख परीक्षार्थियों का इतना बड़ा यज्ञ तो संपन्न हो गया किंतु इसके लिए जो कीमत चुकाई गई, उस पर चिंतन-मनन तो करना ही होगा।
मेरी नजर में आमजन की व्यवस्था को संभालने के लिए नीति-नियम तो बनाने पड़ते हैं किंतु विशेष विघ्नकारी लोगों को धांधली से रोकने के लिए नीयत पर काम किए जाने की जरूरत है।
सेंटर संचालकों और शिक्षित तकनीकी एक्सपर्ट्स को नकल कराने के लिए इतना बड़ा जोखिम लेने हेतु कौन सी मूल सोच प्रेरित कर रही है?
गहराई में जाने पर पता चलता है कि ऐसे लोगों की शिक्षा में मूल्य-चेतना कहीं नहीं है, सिर्फ मनी-चेतना(Money-oriented) है। ऐसे लोगों को ऐसे शिक्षक मिले ही नहीं जो आदर्शों और मूल्यों का जीवन जीते हों।
कोचिंग सेंटर में जहां सिर्फ एग्जाम पास करने की सूचना और तकनीक सिखाई जाती हो, शिक्षक और विद्यार्थी को एक दूसरे के जीवन- मूल्यों से कोई मतलब नहीं रहता हो; वहां से मुन्नाभाइयों के बनने की प्रक्रिया को नहीं रोका जा सकता।
कोचिंग व्यापार को और डमी शिक्षालयों को नियंत्रित किए बिना तथा शिक्षालयों को प्राथमिकता दिए बिना अच्छी नीयत वाले इंसान पैदा करना मुश्किल है। क्योंकि कोचिंग-व्यवस्था में जिसके पास पैसा हो वही शिक्षा पा सकता है। जबकि शिक्षालय निर्धनों की प्रतिभा को भी पहचानता है ,सिर्फ पैसे को नहीं।
आने वाले दिनों में इतनी बड़ी भीड़ को सिर्फ नीतियों-नियमों के आधार पर नहीं चलाया जा सकता ,उसके लिए ऐसे शिक्षालयों और शिक्षकों की जरूरत हैं जो अच्छी नीयत वाले इंसान पैदा कर सकें-
"वे अमीर हैं,निजामे-जहां बनाते हैं
शिक्षक फकीर हैं,मिजाजे-जहां संवारते हैं।"
जहां सरकारें नीति-नियमों द्वारा व्यवस्था बनाती हैं,वहां शिक्षक सोच के परिवर्तन द्वारा नीयत बनाता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
सफल आयोजन की बधाई🙏🌹