संवाद


"प्रेम का पैगंबर गांधी प्रतियोगिता व घृणा की दुनिया में कैसे उतरे?"


गांधी को सिर्फ गोडसे ने नहीं मारा, गांधी के हत्यारे हम सभी तथाकथित गांधीवादी लोग भी हैं जो गांधी पर बोलते और लिखते बहुत हैं; किंतु रत्तिमात्र भी गांधी को जीते नहीं-


"गोडसे ने तो सिर्फ नश्वर शरीर को मारा


किंतु गांधीवाद को अमर कर दिया।


गांधीवादियों ने सिर्फ खादी संभाला


और उन्हें पत्थरों में बेखबर कर दिया।।"


मोहनदास ने व्यक्तिगत धरातल पर जीए जाने वाले सत्य-प्रेम-अहिंसा जैसे उच्चतम मूल्यों को सार्वजनिक जीवन में जीकर और अंग्रेजों के विरुद्ध आजादी के आंदोलन में इसी हथियार से भारत की आत्मा को जागृत कर उन्हें राजनीतिक धरातल पर प्रतिष्ठित कर दिया।


आज का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि व्यक्तिगत जीवन में भी इंसान ने इन मूल्यों से दूरी बना ली,जिसके कारण सर्वत्र व्यभिचार-भ्रष्टाचार-अत्याचार में लिप्त हैवान के दर्शन हो रहे हैं। और गांधी मोहन से महात्मा और महात्मा से भगवान बनने की ओर बढ़ते जा रहे हैं।


गांधी के नाम पर बड़ी-बड़ी मूर्तियां और बड़े-बड़े संस्थान बनाए जा रहे हैं किंतु व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन से गांधी गायब होते जा रहे हैं।


राजनीति तो गांधी को साधन की तरह इस्तेमाल करने लगी है, और अब तो दुरुपयोग करने लगी है। यह राजनीति संसद से लेकर सड़क तक और राजधानी से लेकर गली-मोहल्ले तक इस कदर छा गई है कि "गांधी को कैसे बचाया जाए" यह सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है।


इस प्रश्न के उत्तर की खोज में मेरा ध्यान गांधी जीवन दर्शन समिति के कार्यक्रमों की ओर गया,जिसके अंतर्गत 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में अनेक प्रकार की प्रतियोगिताएं, चर्चाएं और भाषणों का आयोजन किया गया। किंतु मेरे हृदय को आकर्षित किया "बा-बापू वाटिका" योजना ने जिसके अंतर्गत समिति सदस्यों द्वारा जन सहयोग से पौधे लगाए जा रहे हैं और प्रेम के फूल खिलाए जा रहे हैं।


पर्यावरण प्रदूषण के इस जमाने में यदि हम हर गली-मोहल्ले में इस प्रेम की वाटिका को लगा सकें तो परिवेश में फैलती हुई विभिन्न रंगों वाली फूलों की सुगंध बा और बापू की याद दिलाएगी। यह सुगंध हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सभी को समान रुप से सुवासित करेगी। वहां पर हर प्रकार के परिंदे अपने आशियाने बनाएंगे।


जो पेड़-पौधों से प्रेम करने लगा,वह कब तक पशु-पंक्षियों से प्रेम करने से अपने आप को बचाएगा।


जो पौधे-पंक्षियों से प्रेम करने लगेगा,वह इंसान के प्रेम से अपने आप को दूर कैसे रख सकता है?


गांधी को प्राप्त करने का मुझे यह सबसे बेहतर रास्ता दिखता है क्योंकि पेड़-पौधे और पशु-पंक्षियों से हमारी कोई अपेक्षा नहीं होती । प्रकृति से जुड़ाव के इस नि:स्वार्थ लगाव द्वारा मनुष्य के अंदर प्रेम का बीज विकसित होता है।


फिर वह गांधी की तरह मुसलमानों से भी उतना ही प्रेम कर सकता है जितना हिंदुओं से; अपने शत्रुओं से भी उतना ही प्रेम कर सकता है जितना अपने मित्रों से।


क्योंकि "ईशावास्यमिदं सर्वम्" अर्थात् सब कुछ परमात्मा का है, यह गांधी का जीवन-मंत्र था।


यह कौन चमनपरस्त गुजरा है इन राहों से


हमने कांटो पर भी होठों के निशान देखे हैं


'शिष्य गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


विश्व अहिंसा दिवस की शुभकामना 🙏🌹